एक शाइर, सौ शेर: मिर्ज़ा ग़ालिब

एक शाइर, सौ शेर: मिर्ज़ा ग़ालिब

1.
फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं,
फिर वही ज़िंदगी हमारी है

2.
बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिसकी पर्दा-दारी है

3.
हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने,
ग़ैर को तुझ से मुहब्बत ही सही

4.
हम कोई तर्क-ए-वफ़ा करते हैं,
न सही इश्क़ मुसीबत ही सही

5.
यार से छेड़ चली जाए ‘असद’
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही

6.
आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब’
कोई दिन और भी जिए होते

7.
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती

8.
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

9.
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

10.
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

11.
क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

12.
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

13.
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

14.
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुमको मगर नहीं आती

15.
की वफ़ा हमसे तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं,
होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं

16.
आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उनसे
कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं

17.
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

18.
हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक

19.
इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई,
मेरे दुःख की दवा करे कोई

20.
चाल जैसे कड़ी कमान का तीर,
दिल में ऐसे कि जा करे कोई

21.
बात पर वाँ ज़बान कटती है
वो कहें और सुना करे कोई

22.
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

23.
न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई

24.
रोक लो गर ग़लत चले कोई
बख़्श दो गर ख़ता करे कोई

25.
मिलना तिरा अगर नहीं आसाँ तो सहल है,
दुश्वार तो यही है कि दुश्वार भी नहीं

26.
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

27.
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे (बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल: बच्चों का खेल)

28.
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तिरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे

29.
ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र,
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

30.
ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते,
आई शब-ए-हिज्राँ की तमन्ना मिरे आगे

31.
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

32.
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

33.
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

34.
जम्अ करते हो क्यूँ रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ

35.
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ

36.
है ख़बर गर्म उनके आने की
आज ही घर में बोरिया न हुआ

37.
जान दी, दी हुई उसी की थी
हक़ तो यूँ है कि हक़ अदा न हुआ

38.
ज़ख़्म गर दब गया लहू न थमा
काम गर रुक गया रवा न हुआ

39.
कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं
आज ‘ग़ालिब’ ग़ज़ल-सरा न हुआ

40.
ज़िंदगी में तो वो महफ़िल से उठा देते थे
देखूँ अब मर गए पर कौन उठाता है मुझे

41.
बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना

42.
की मिरे क़त्ल के बा’द उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमां का पशेमां होना   (ज़ूद-पशीमां: बहुत जल्दी पछतावा करने वाला)

43.
चाहिए अच्छों को जितना चाहिए,
ये अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए

44.
दुश्मनी ने मेरी खोया ग़ैर को,
किस क़दर दुश्मन है देखा चाहिए

45.
दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना,
बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ

46.
दिल, ए नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

47.
हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है

48.
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ’ क्या है

49.
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है

50.
हमको उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

51.
हाँ भला कर तिरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है

52.
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है

53.
मैंने माना कि कुछ नहीं ‘ग़ालिब’
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

54.
दोनों जहान दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
याँ आ पड़ी ये शर्म कि तकरार क्या करें

55.
थक थक के हर मक़ाम पे दो चार रह गए,
तेरा पता न पाएँ तो नाचार क्या करें

56.
कहा है किस ने कि ‘ग़ालिब’ बुरा नहीं लेकिन,
सिवाए इस के कि आशुफ़्ता-सर है क्या कहिए (आशुफ़्ता-सर: जिसका सर फिर गया हो)

57.
हर-चंद हर एक शय में तू है
पर तुझ सी कोई शय नहीं है

58.
हस्ती है न कुछ अदम है ‘ग़ालिब’,
आख़िर तू क्या है ऐ नहीं है

59.
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

60.
तिरे वा’दे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता

61.
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को,
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

62.
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

63.
ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान ‘ग़ालिब’,
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता

64.
दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए,
क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फ़लत-शिआरी हाए हाए

65.
इश्क़ ने पकड़ा न था ‘ग़ालिब’ अभी वहशत का रंग,
रह गया था दिल में जो कुछ ज़ौक़-ए-ख़्वारी हाए हाए

66.
दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को इक अदा में रज़ा-मंद कर गई

67.
मारा ज़माने ने असदुल्लाह ख़ाँ तुम्हें,
वो वलवले कहाँ वो जवानी किधर गई

68.
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो,
कहे से कुछ न हुआ फिर कहो तो क्यूँकर हो

69.
हमारे ज़हन में इस फ़िक्र का है नाम विसाल
कि गर न हो तो कहाँ जाएँ हो तो क्यूँकर हो

70.
उलझते हो तुम अगर देखते हो आईना,
जो तुम से शहर में हों एक दो तो क्यूँकर हो

71.
हम थे मरने को खड़े पास न आया न सही,
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

72.
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’,
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था (रेख़्ते: उर्दू का पुराना नाम)

73.
दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं,
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

74.
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा,
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

75.
बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर ‘असद’,
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

76.
क़सम जनाज़े पे आने की मेरे खाते हैं ‘ग़ालिब’,
हमेशा खाते थे जो मेरी जान की क़सम आगे

77.
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे,
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

78.
‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे (वाइज़: धर्मगुरु)

79.
जल्लाद से डरते हैं न वाइज़ से झगड़ते,
हम समझे हुए हैं उसे जिस भेस में जो आए

80.
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

81.
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

82.
मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए,
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले

83.
मुब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

84.
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

85.
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

86.
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

87.
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो

88.
बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए
कोई हम-साया न हो और पासबाँ कोई न हो

89.
‘ग़ालिब’-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं,
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ

90.
नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने,
क्या बने बात जहाँ बात बताए न बने

91.
ग़ैर फिरता है लिए यूँ तिरे ख़त को कि अगर,
कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बने

92.
मौत की राह न देखूँ कि बिन आए न रहे,
तुम को चाहूँ कि न आओ तो बुलाए न बने

93.
बोझ वो सर से गिरा है कि उठाए न उठे,
काम वो आन पड़ा है कि बनाए न बने

94.
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

95.
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो,
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

96.
दिल को आँखों ने फँसाया क्या मगर,
ये भी हल्क़े हैं तुम्हारे दाम के (हल्क़े: ज़ंजीर)

97.
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

98.
हाल-ए-दिल नहीं मा’लूम लेकिन इस क़दर या’नी,
हमने बारहा ढूँढा तुमने बारहा पाया

99.
न सताइश की तमन्ना न सिले की पर्वा,
गर नहीं हैं मिरे अशआ’र में मा’नी न सही

100.
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का,
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का

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