एक शाइर, सौ शेर: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

एक शाइर, सौ शेर: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

1.
दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के,
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

2.
इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले पर्वरदिगार के

3.
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

4.
भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के

5.
सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं,
हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं

6.
उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं

7.
हर इक क़दम अजल था हर इक गाम ज़िंदगी
हम घूम फिर के कूचा-ए-क़ातिल से आए हैं

8.
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे

9.
और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया

10.
वो मिरे हो के भी मिरे न हुए
उन को अपना बना के देख लिया

11.
आज उन की नज़र में कुछ हमने
सब की नज़रें बचा के देख लिया

12.
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

13.
कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं
सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं

14.
मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ,
दिल वालों कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं

15.
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा,
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

16.
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले,
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

17.
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले (सबा- बयार, धीरे-धीरे चलती हवा)

18.
बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही,
तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले

19.
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले (आक़िबत: आख़िरत, अंत)

20.
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं (क़बा- लिबास)

21.
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

22.
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है,
जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

23.
हमने सब शेर में सँवारे थे
हमसे जितने सुख़न तुम्हारे थे

24.
उम्र-ए-जावेद की दुआ करते
‘फ़ैज़’ इतने वो कब हमारे थे

25.
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है,
दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है

26.
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

27.
भीगी है रात ‘फ़ैज़’ ग़ज़ल इब्तिदा करो,
वक़्त-ए-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है

28.
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही,
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

29.
गर इंतिज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल,
किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तुगू ही सही

30.
वफ़ा-ए-वादा नहीं वादा-ए-दिगर भी नहीं,
वो मुझ से रूठे तो थे लेकिन इस क़दर भी नहीं

31.
न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ,
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं

32.
निगाह-ए-शौक़ सर-ए-बज़्म बे-हिजाब न हो
वो बे-ख़बर ही सही इतने बे-ख़बर भी नहीं

33.
तुम आए हो न शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है
तलाश में है सहर बार बार गुज़री है

34.
वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था,
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है

35.
न गुल खिले हैं न उनसे मिले न मय पी है,
अजीब रंग में अब की बहार गुज़री है

36.
“आपकी याद आती रही रात भर”,
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

*फ़ैज़ की ये ग़ज़ल मख़दूम की मशहूर ग़ज़ल की ज़मीन पर है, ये फ़ैज़ ने मख़दूम की याद में कही थी. मिसरा-ए-ऊला (पहला मिसरा) मख़दूम ने कहा है.

37.
गाह जलती हुई गाह बुझती हुई,
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर

38.
कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात भर

39.
एक उम्मीद से दिल बहलता रहा,
इक तमन्ना सताती रही रात भर

40.
बात बस से निकल चली है,
दिल की हालत सँभल चली है

41.
अब जुनूँ हद से बढ़ चला है
अब तबीअ’त बहल चली है

42.
लाख पैग़ाम हो गए हैं,
जब सबा एक पल चली है (सबा- बयार, धीरे-धीरे चलती हवा)

43.
जाओ अब सो रहो सितारो
दर्द की रात ढल चली है

44.
हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए,
काफ़िरों की नमाज़ हो जाए (मजाज़- वैध)

45.
मिन्नत-ए-चारा-साज़ कौन करे,
दर्द जब जाँ-नवाज़ हो जाए (मिन्नत-ए-चारा-साज़: डॉक्टर से विनती)

46.
इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो,
लब पे आए तो राज़ हो जाए

47.
उम्र बे-सूद कट रही है ‘फ़ैज़’,
काश इफ़शा-ए-राज़ हो जाए (इफ़शा-ए-राज़: राज़ का खुलना)

48.
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे,
कब तक चैन की मुहलत दोगे कब तक याद न आओगे

49.
बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में,
कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे

50.
हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाक़ी,
ज़ब्त का हौसला नहीं बाक़ी

51.
इक तिरी दीद छिन गई मुझसे
वर्ना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी

52.
हो चुका ख़त्म अहद-ए-हिज्र-ओ-विसाल,
ज़िंदगी में मज़ा नहीं बाक़ी

53.
बे-दम हुए बीमार दवा क्यूँ नहीं देते,
तुम अच्छे मसीहा हो शिफ़ा क्यूँ नहीं देते (शिफ़ा- इलाज)

54.
मिट जाएगी मख़्लूक़ तो इंसाफ़ करोगे,
मुंसिफ़ हो तो अब हश्र उठा क्यूँ नहीं देते (मख़्लूक़- सृष्टि, मुंसिफ़- जज, हश्र- क़यामत का दिन)

55.
बर्बादी-ए-दिल जब्र नहीं ‘फ़ैज़’ किसी का,
वो दुश्मन-ए-जाँ है तो भुला क्यूँ नहीं देते

56.
हमीं से अपनी नवा हम-कलाम होती रही,
ये तेग़ अपने लहू में नियाम होती रही (हम-कलाम: एक साथ बातचीत, तेग़: तलवार, नियाम: म्यान)

57.
जो कुछ भी बन न पड़ा ‘फ़ैज़’ लुट के यारों से
तो रहज़नों से दुआ-ओ-सलाम होती रही

58.
दिल में अब यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं,
जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं

59.
एक इक करके हुए जाते हैं तारे रौशन
मेरी मंज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं

60.
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग़,
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं

61.
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो,
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं

62.
अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सबकी ज़बाँ ठहरी है
जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है

63.
वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबुक गुज़री थी
हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गिराँ ठहरी है (वस्ल- मिलन, हिज्र- जुदाई, शब- रात)

64.
आते आते यूँही दम भर को रुकी होगी बहार,
जाते जाते यूँही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है

65.
चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का,
रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का (ज़ेबाई- सुन्दरता, जानिब- दिशा, तरफ़)

66.
एक बार और मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ
कोई वा’दा कोई इक़रार मसीहाई का (मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ: घायल दिल के दिल का मसीहा)

67.
दीदा ओ दिल को सँभालो कि सर-ए-शाम-ए-फ़िराक़
साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का

68.
गो सब को बहम साग़र ओ बादा तो नहीं था
ये शहर उदास इतना ज़ियादा तो नहीं था (साग़र- शराब का प्याला, बादा- शराब)

69.
गलियों में फिरा करते थे दो चार दिवाने
हर शख़्स का सद चाक लबादा तो नहीं था

70.
मंज़िल को न पहचाने रह-ए-इश्क़ का राही
नादाँ ही सही ऐसा भी सादा तो नहीं था

71.
हम सादा ही ऐसे थे की यूँ ही पज़ीराई
जिस बार ख़िज़ाँ आई समझे कि बहार आई (पज़ीराई: स्वीकृति)

72.
हम मुसाफ़िर यूँही मसरूफ़-ए-सफ़र जाएँगे
बे-निशाँ हो गए जब शहर तो घर जाएँगे (मसरूफ़-ए-सफ़र: सफ़र में व्यस्त)

73.
किस क़दर होगा यहाँ महर-ओ-वफ़ा का मातम
हम तिरी याद से जिस रोज़ उतर जाएँगे

74.
जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ार-ए-सुख़न
हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर जाएँगे

75.
नेमत-ए-ज़ीस्त का ये क़र्ज़ चुकेगा कैसे
लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएँगे (ज़ीस्त- ज़िन्दगी)

76.
‘फ़ैज़’ आते हैं रह-ए-इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम
आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएँगे

77.
है वही बात यूँ भी और यूँ भी
तुम सितम या करम की बात करो

78.
हिज्र की शब तो कट ही जाएगी
रोज़-ए-वस्ल-ए-सनम की बात करो

79.
जान जाएँगे जानने वाले
‘फ़ैज़’ फ़रहाद ओ जम की बात करो

80.
न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई
तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या

81.
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी
बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या (बहम- साथ)

82.
पहुँच के दर पे तिरे कितने मो’तबर ठहरे
अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या

83.
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से
बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या

84.
सितम पे ख़ुश कभी लुत्फ़-ओ-करम से रंजीदा
सिखाईं तुमने हमें कज-अदाइयाँ क्या क्या (रंजीदा- दुःख, कज-अदाइयाँ: अशिष्टता)

85.
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं

86.
जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उनको सुनाने के दिन आ रहे हैं

87.
अभी से दिल ओ जाँ सर-ए-राह रख दो
कि लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं

88.
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं

89.
सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं (सबा- बयार, धीरे-धीरे चलती हवा)

90.
चलो ‘फ़ैज़’ फिर से कहीं दिल लगाएँ
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं

91.
फिर हरीफ़-ए-बहार हो बैठे,
जाने किस किस को आज रो बैठे (हरीफ़-ए-बहार: बहार का दुश्मन)

92.
थी मगर इतनी राएगाँ भी न थी
आज कुछ ज़िंदगी से खो बैठे

93.
तेरे दर तक पहुँच के लौट आए
इश्क़ की आबरू डुबो बैठे

94.
सारी दुनिया से दूर हो जाए
जो ज़रा तेरे पास हो बैठे

95.
न गई तेरी बे-रुख़ी न गई
हम तिरी आरज़ू भी खो बैठे

96.
‘फ़ैज़’ होता रहे जो होना है
शेर लिखते रहा करो बैठे

97.
नहीं ख़ौफ़-ए-रोज़-ए-सियह हमें कि है ‘फ़ैज़’ ज़र्फ़-ए-निगाह में
अभी गोशा-गीर वो इक किरण जो लगन उस आईना-रू की है

(ख़ौफ़-ए-रोज़-ए-सियह: काले दिन का डर, ज़र्फ़-ए-निगाह: नज़र की मौत, गोशा-गीर: किनारे पर रहने वाला)

98.
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में लुत्फ़-ए-बहाराँ
बर्ग-ए-समन कुछ इस से ज़ियादा

(फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ: पतझड़ का मौसम, लुत्फ़-ए-बहाराँ: बहार का आनंद, बर्ग-ए-समन: चमेली के पंखुड़ियों)

99.
दिल-शिकनी भी दिलदारी भी
याद-ए-वतन कुछ इस से ज़ियादा

100.
इश्क़ में क्या है ग़म के अलावा
ख़्वाजा-ए-मन कुछ इस से ज़ियादा

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