दो शा’इर, दो ग़ज़लें (19): क़तील शिफ़ाई और दाग़ देहलवी

क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल: दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं, लोग अब मुझ को तिरे

आगे पढ़ें..

दो शाइर, दो नज़्में(9): फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और अख़्तर-उल-ईमान

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म: बोल बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बाँ अब तक तेरी है तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा बोल कि

आगे पढ़ें..

दो शा’इर, दो ग़ज़लें (18): कैफ़ी आज़मी और अल्लामा इक़बाल

कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल: हाथ आ कर लगा गया कोई हाथ आ कर लगा गया कोई, मेरा छप्पर उठा गया कोई लग गया इक मशीन

आगे पढ़ें..

दो शा’इर, दो ग़ज़लें (17): शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ और अहमद फ़राज़

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की ग़ज़ल: चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए

आगे पढ़ें..

दो शाइर, दो नज़्में(7): परवीन शाकिर और फ़हमीदा रियाज़

परवीन शाकिर की नज़्म: नहीं मेरा आँचल मैला है नहीं मेरा आँचल मैला है और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं किसी

आगे पढ़ें..

दो शा’इर, दो ग़ज़लें (16): निदा फ़ाज़ली और अल्लामा इक़बाल

निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल: कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता तमाम

आगे पढ़ें..

दो शा’इर, दो ग़ज़लें (15): वसीम बरेलवी और जलील मानिकपुरी

वसीम बरेलवी की ग़ज़ल मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा, अब इसके ब’अद मिरा इम्तिहान क्या लेगा ये एक मेला है व’अदा

आगे पढ़ें..

दो शाइर, दो नज़्में(6): जाँ निसार अख़्तर और जिगर श्योपुरी

जाँ निसार अख़्तर की नज़्म: तजज़िया मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन, फिर भी जब पास तू नहीं होती ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ गुम

आगे पढ़ें..

दो शा’इर दो रूबाई (6): मीर और सादिक़ैन

मीर तक़ी मीर की रूबाई तुम तो ऐ महरबान अनूठे निकले जब आन के पास बैठे रूठे निकले क्या कहिए वफ़ा एक भी वअ’दा न

आगे पढ़ें..

दो शा’इर दो रूबाई (5): ग़ालिब और फ़िराक़..

मिर्ज़ा ग़ालिब की रूबाई कहते हैं कि अब वो मर्दम-आज़ार नहीं उशशाक़ की पुरसिश से उसे आर नहीं जो हाथ कि ज़ुल्म से उठाया होगा

आगे पढ़ें..

error: Content is protected !!