ग़ज़ल

ग़ज़ल शाइरी

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ…. अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मुहब्बत का भरम रख तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ किस-किस को बताएँगे जुदाई […]

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ग़ज़ल शाइरी

वही फिर मुझे याद आने लगे हैं …ख़ुमार बाराबंकवी

वही फिर मुझे याद आने लगे हैंजिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं वो हैं पास और याद आने लगे हैंमुहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं सुना है हमें वो भुलाने लगे हैंतो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं हटाए थे जो राह से दोस्तों कीवो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं ये […]

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इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं…ज़हरा निगाह

इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं आने वाले बरसों ब’अद भी आते हैं हमने जिस रस्ते पर उसको छोड़ा है फूल अभी तक उस पर खिलते जाते हैं दिन में किरनें आँख-मिचोली खेलती हैं रात गए कुछ जुगनू मिलने जाते हैं देखते-देखते इक घर के रहने वाले अपने अपने ख़ानों में बट जाते हैं […]

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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता …. निदा फ़ाज़ली

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहाँ उमीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं ज़बाँ मिली है […]

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बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी…. बहादुर शाह ज़फ़र

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रार बे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी उसकी आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू कि तबीअ’त मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी […]

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