दो शाइर दो ग़ज़लें

दो शाइर दो ग़ज़लें शाइरी

दो शाइर, दो ग़ज़लें (23): राजेन्द्र मनचंदा बानी और अहमद फ़राज़

ऐ दोस्त मैं ख़ामोश किसी डर से नहीं था क़ाइल ही तिरी बात का अंदर से नहीं था हर आँख कहीं दौर के मंज़र पे लगी थी बेदार कोई अपने बराबर से नहीं था क्यूँ हाथ हैं ख़ाली कि हमारा कोई रिश्ता जंगल से नहीं था कि समुंदर से नहीं था अब उसके लिए इस […]

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दो शाइर, दो ग़ज़लें (23): असग़र गोंडवी और अल्लामा इक़बाल

असग़र गोंडवी की ग़ज़ल: जीने का न कुछ होश न मरने की ख़बर है जीने का न कुछ होश न मरने की ख़बर है ऐ शोबदा-पर्दाज़ ये क्या तर्ज़-ए-नज़र है सीने में यहाँ दिल है न पहलू में जिगर है अब कौन है जो तिश्ना-ए-पैकान-ए-नज़र है है ताबिश-ए-अनवार से आलम तह-ओ-बाला जल्वा वो अभी तक […]

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दो शाइर, दो ग़ज़लें (22): मिर्ज़ा ग़ालिब और परवीन शाकिर…

मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है कि अगर तंग न होता तो परेशाँ होता बाद यक-उम्र-ए-वरा बार तो देता बारे काश रिज़वाँ ही दर-ए-यार का दरबाँ होता ___________________________________ परवीन शाकिर की ग़ज़ल […]

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दो शाइर, दो ग़ज़लें (21): जन्मदिन विशेष में मजरूह सुल्तानपुरी की ग़ज़लें

दो शा’इर, दो ग़ज़लें सिरीज़ में यूँ तो हम दो अलग-अलग शाइरों की ग़ज़लें पाठकों के लिए साझा करते हैं लेकिन आज मजरूह सुल्तानपुरी के जन्मदिन पर हम उन्हीं की दो ग़ज़लें पेश कर रहे हैं. ग़ज़ल 1 डरा के मौज ओ तलातुम से हम-नशीनों को यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को शराब […]

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दो शा’इर, दो ग़ज़लें (20): दुष्यंत कुमार और मजाज़

दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल: ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो दर्द-ए-दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा इस कबूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे आज सय्याद को महफ़िल […]

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दो शा’इर, दो ग़ज़लें (19): क़तील शिफ़ाई और दाग़ देहलवी

क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल: दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं, लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं आईना-दार-ए-मोहब्बत हूँ कि अरबाब-ए-वफ़ा अपने ग़म को मिरे अंजाम से पहचानते हैं बादा ओ जाम भी इक वजह-ए-मुलाक़ात सही हम तुझे गर्दिश-ए-अय्याम से पहचानते हैं पौ […]

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दो शा’इर, दो ग़ज़लें (18): कैफ़ी आज़मी और अल्लामा इक़बाल

कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल: हाथ आ कर लगा गया कोई हाथ आ कर लगा गया कोई, मेरा छप्पर उठा गया कोई लग गया इक मशीन में मैं भी शहर में ले के आ गया कोई मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी इश्तिहार इक लगा गया कोई ये सदी धूप को तरसती है जैसे सूरज […]

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दो शा’इर, दो ग़ज़लें (17): शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ और अहमद फ़राज़

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की ग़ज़ल: चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए जी ही जी में तिलमिलाना कोई हम से सीख जाए अब्र क्या आँसू बहाना कोई हम से सीख जाए बर्क़ क्या है तिलमिलाना कोई हम से सीख जाए ज़िक्र-ए-शम-ए-हुस्न लाना […]

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दो शा’इर, दो ग़ज़लें (16): निदा फ़ाज़ली और अल्लामा इक़बाल

निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल: कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता ये […]

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दो शा’इर, दो ग़ज़लें (15): वसीम बरेलवी और जलील मानिकपुरी

वसीम बरेलवी की ग़ज़ल मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा, अब इसके ब’अद मिरा इम्तिहान क्या लेगा ये एक मेला है व’अदा किसी से क्या लेगा, ढलेगा दिन तो हर इक अपना रास्ता लेगा मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा, कोई चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा कलेजा […]

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