आज की कहानी- तितलियाँ

आज की कहानी- तितलियाँ

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आज की कहानी साहित्य दुनिया के लिए अरग़वान रब्बही ने लिखी है.
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ऑटो से उतर के जल्दी-जल्दी अपने घर की तरफ बढ़ते हुए अशोक को आस-पास के लोग जैसे घूरने से लग गए थे…. घर के चबूतरे से लगे ज़ीने पे उसने जैसे ही क़दम रखा, पास गमले की ज़मीन पे बैठी तितली उड़ गयी। दरवाज़ा बंद था, एक बार हाथ घंटी तक ले गया लेकिन ख़ुश्क हाथ फिर वापिस हो गए…ठहर कर सोच ही रहा था कि किस तरह बात करूंगा, दरवाज़ा खुल गया ..
“अरे भाईसाब , आइए” इतना कह कर दरवाज़े के उस पार खड़ी औरत, बेतहाशा रोने लगी लेकिन अशोक नहीं रोया, वो रोते-रोते अपने भाई के गले लग गयी…उसने उसे संभाला लेकिन कुछ नहीं कहा…घर के अन्दर से बाक़ी लोग भी आ गए, जो दिखा वो रोता हुआ दिखा.. अशोक ने किसी पे ध्यान नहीं दिया, बैठक के ठीक बग़ल के कमरे में बेड पर बैठी सीमा की नज़र जैसे ही अपने पति पर पड़ी वो सीना पीटने लगी, रोने लगी…बेतहाशा, बेड के दूसरे किनारे बैठी उसकी 18 साल की जवान लड़की ख़ुशी ने जैसे ही अपने पापा को देखा, वो दौड़ के उनके गले लग गयी। बाप ने सर पे हाथ रखा और वो रो पड़ी, आस-पास के रिश्तेदार, अशोक की बहनें और उसकी बीवी ये देख और ज़ोर लगा के रोने लगे..
“अरे, नहीं-नहीं रोते नहीं… चुप-चुप” उसने अपनी बेटी को चुपाने की कोशिश की …. उसने उसे वहीं बैठाया और पास बैठ गया… अगले कुछ मिनट किसी ने कोई बात नहीं की, सब ख़ामोश थे, गाँव से उसके घर के भाई और दूसरे रिश्तेदार भी अब उसे नज़र आने लगे… आते-जाते सलामों के जवाब वो इस तरह देता गया मानो कुछ नहीं हुआ ।

कुछ देर बाद,
“देखो, तुमने अपनी बेटी को बहुत छूट दी, अब नतीजा देखो” अशोक के बड़े भाई ने कहा..
“हम कहते हैं लड़कियों को कोई इतनी छूट देता है क्या?? बताओ” पास बैठे एक दूसरे बुज़ुर्ग ने सवाल किया
“..और भेजो अकेले लड़की को, मॉडर्न कपड़े पहनाओ…हो गया न, लड़की इज़्ज़त गँवा के आ गयी ” अशोक ने उनकी तरफ़ देखा और प्लास्टिक की सफ़ेद कुर्सी से उठा और अपनी बेटी के पास गया, जो अभी भी उसी कमरे में बैठी थी, वो उसी अंदाज़ में रो रही थी…
“एक बात पूछूँ?” परेशान लड़की ने हाँ में सर हिलाया…
“जो हुआ उसमें तुम्हारी कोई ग़लती है? ”
ख़ुशी ने कुछ नहीं कहा, अशोक ने ख़ुद से जवाब दिया,”नहीं है बिलकुल नहीं.. जो हुआ वो महज़ एक दुर्घटना थी तुम्हारे लिए जिसने ये हरकत की…सज़ा उसको मिलनी चाहिए तुम्हें नहीं,”
“पापा लेकिन सब कहते हैं..”
“सब पागल हैं, इज़्ज़त लोटे में लेके चलते हैं किसी ने ठोकर मारी और लोटे की इज़्ज़त ज़मीन पर, हमारी इज़्ज़त हमारा ज़मीर है .. किसी के रेप करने से तुम्हारी इज़्ज़त नहीं जाती, समझो ये .. जिसने गुनाह किया है सज़ा उसको हो , मुझे नहीं पता कि हम उसे सज़ा दिलाने में कामयाब होंगे या नहीं लेकिन मैं तुम्हें सज़ा नहीं होने दूंगा, तुम्हारी ख़ुशियों का गला नहीं घुटने दूंगा, तुम्हें जो पसंद है तुमने किया है, तुम्हें वही करना भी है.. अगर तुम अपने पापा से प्यार करती हो तो तुम वही करोगी जो तुम्हारे दिल को ख़ुशी देता हो, ”
ख़ुशी की आँखों में खुशनुमा चमक आ गयी और जो अश्क अश्क थे वो मोती बन गए …
“मेरा एक काम करोगी? ”
“हाँ , करुँगी पापा”
“मुझे जलेबी खानी है, ला दोगी बाहर से ?”
पीछे से किसी की आवाज़ आयी “अभी मन भरा नहीं है फिर अकेले भेज रहे हो जबकि सब यहीं हैं किसी से मंगा लो ..”
“आप चुप रहिए, मैं अपनी बच्ची से बात कर रहा हूँ,” जाओ तुम, आधा किलो लाना …पैसे हैं ?”
“हाँ हैं,” आधी ख़ुशी अपने आधे ग़म के साथ आधे मन से तैयार हुई और जाने लगी…
दरवाज़े पे खड़े होके अशोक उसे देखता रहा, कुछ लोग ख़ुशी को घूर रहे थे पर तब वो पलट के अपने पिता की तरफ़ देखती और आगे बढ़ जाती … जलेबी लेके वो आ गयी, सुबह से लेके दोपहर हो गयी थी अशोक नहीं रोया था पर अपनी बच्ची को अपने पैरों पे खड़ा देख वो रो पड़ा और ख़ुशी अपने बाप के गले लग गयी।

~ समाप्त ~

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