शाइरी की बातें (1): शाइरी क्या है?

अक्सर हमारे ज़हन में ये सवाल आता है कि शा’इरी क्या है? ज़ाहिर है ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब हर एक इंसान अलग-अलग तरह से देगा, मेरी नज़र में शाइरी वो संगीत है जिसके ज़रिए हम अपनी बात कहते हैं. कोई बात जो बहुत अच्छी है, उसको आप अगर दो या चार लाइन में लिख दें तो वो शा’इरी तब तक नहीं होगी जब तक कि उसमें मौसिक़ी यानी कि संगीत न हो. मौसिक़ी से यहाँ मतलब है लयबद्ध संरचना. पिछले कई सालों में इस बात को हमने देखा है कि लोग कोई बात दो मिसरों में लिख देते हैं और कहते हैं कि उन्होंने ये शे’र लिखा है. कई बार लोगों को लगता है कि कोई बहुत ख़ास बात अगर वो लिख दें तो वो शा’इरी है. असल में ऐसा नहीं है. हो सकता है कि ये फ़िलासफ़ी हो लेकिन फ़िलासफ़ी का शा’इरी होना ज़रूरी नहीं है.

शा’इरी की कई क़िस्में हैं और हर एक क़िस्म के कुछ विशेष नियम हैं. आने वाले दिनों में हम इन सभी नियमों से आपको रूबरू कराएँगे. फ़िलहाल, शा’इरी की क़िस्मों के बारे में कुछ शुरूआती बातचीत कर लेते हैं-

ग़ज़ल: एक ही ज़मीन में कहे गए अश’आर(शेर का बहुवचन) के समूह को ग़ज़ल कहते हैं. पूरी ग़ज़ल एक बह्र में कही जाती है.  ग़ज़ल की एक ख़ास बात ये भी है कि एक ग़ज़ल में कई शेर होते हैं और हर एक शे’र का अपना अर्थ होता है. या’नी, हर शेर अपने आप में मुकम्मल अर्थ रखता है. एक बात समझना बहुत ज़रूरी है कि  मतलब के लिहाज़ से एक ग़ज़ल के दो शे’रों का कोई सम्बन्ध नहीं होता है.  कुल मिलाकर रदीफ़, क़ाफ़िए की पाबंदी और एक ही बह्र का होना ग़ज़ल में ज़रूरी है.
वो शे’र जिसके दोनों मिसरे रदीफ़ और क़ाफ़िए पर ख़त्म होते हैं उन्हें मत’ला कहते हैं. एक ग़ज़ल में एक से अधिक मत’ले हो सकते हैं.  ग़ज़ल में शे’रों की संख्या निर्धारित नहीं है, फिर भी ये माना जाता है कि इसमें कम से कम पांच शे’र तो होने ही चाहिएँ और अधिक से अधिक शे’रों की कोई सीमा नहीं है. गुज़िश्ता ज़माने में लोग ये मानते थे कि ग़ज़ल में अश’आर (शे’रों) की संख्या विषम होनी चाहिए लेकिन इस नियम का न तब कोई पालन करता था और न ही आज इस पर कोई ध्यान देता है, यूँ भी इस नियम का कोई मतलब भी नहीं है.

फ़र्द: फ़र्द का अर्थ है अद्वितीय, अकेला. फ़र्द का इस्तेमाल जब हम शा’इरी के काव्य-शास्त्र को लेकर करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि कोई ऐसा अकेला शेर जो ख़ुद में अकेला है. कहने का अर्थ ये है कि एक ग़ज़ल में कई शे’र होते हैं और हर शे’र एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये और बह्र पर बंधा होता है जिसे हम ज़मीन कहते हैं. परन्तु कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी ज़मीन में शा’इर एक ही शे’र कह पाता है और ग़ज़ल मुकम्मल होने के बजाय बस एक ही शे’र पर सिमट जाती है. ऐसे में इसे “फ़र्द” कहा जाता है.

नज़्म: नज़्म की सबसे ज़रूरी बात है वो ये कि पूरी नज़्म एक ही बात को कहती है और अपने टॉपिक से बाहर की बात नहीं करती है. ग़ज़ल और नज़्म में एक बड़ा फ़र्क़ ये भी है कि एक ही ग़ज़ल में अलग-अलग मुद्दों पर बात की जा सकती है, ग़ज़ल का एक शेर रूमानी हो सकता है तो एक इंक़लाबी जबकि नज़्म शुरू’अ से लेकर अंत तक एक ही टॉपिक पर बात करती है. नज़्म पाबन्द भी होती है और आज़ाद भी, और आजकल के दौर में नस्री(गद्य) नज़्म का भी विकास हुआ है.

क़त्आ: दो या दो से अधिक शे’रों में जब एक विषय को शा’इरी में शामिल करने की कोशिश की जाती है तो शे’रों के इस समूह को क़त्’आ कहते हैं. क़त्आ ग़ज़ल के अन्दर भी हो सकते हैं और उसके बाहर भी, इसमें कोई पाबंदी जैसी चीज़ नहीं है.

रूबाई: रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है.

हम्द: ख़ुदा की तारीफ़ में जब कोई कविता कही जाती है तो उसे हम्द कहा जाता है.
न’अत: इस्लाम धर्म के संस्थापक और आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद की तारीफ़ में कही गयी कविताओं को न’अत कहा जाता है.
क़सीदा: क़सीदा किसी की तारीफ़ में कही गयी ऐसी कविता है जिसमें लयबद्धता तो ग़ज़ल की होती है लेकिन ये किसी की तारीफ़ में ही कही जाती है. गुज़िश्ता दौर में राजाओं, नवाबों को ख़ुश करने के लिए इस तरह की कविता का चलन था.

सलाम और नौहा: हज़रत हुसैन की शहादत पर मायूसी जताने की कविताओं को इसके अंतर्गत रखा जाता है.
मर्सिया: ये एक शोक कविता होती है जो इमाम हुसैन और उनके साथियों की बहादुरी और शहादत को सलाम करती है.
दोहा: दोहा हिंदी शायरी की विधा है. उर्दू में भी अब ये स्थापित हो चुकी है. हर एक दोहे में दो मिसरे होते हैं, हर एक मिसरे में दो चरण. इस लिहाज़ से एक दोहे में चार चरण होते हैं. प्रत्येक मिसरे के पहले चरण में 13 मात्राएँ होती हैं और दूसरे में 11 मात्राएँ होती हैं. हर मिसरे के दोनों चरणों के बीच हल्का सा ठहराव होता है.

मुख़म्मस: ये ऐसी कविता को कहा जाता है जिसमें पाँच-पाँच मिसरों के बंद होते हैं. इसमें चार मिसरों में एक ही रदीफ़-क़ाफ़िये होते हैं और पाँचवे में अलग लेकिन सारे बंदों के पाँचवे मिसरे एक ही रदीफ़-क़ाफ़िये पर ख़त्म होते हैं. कभी-कभी यूँ भी होता है कि आख़िर में बार-बार एक ही मिसरा आता है.

मुसद्दस: 6-6 मिसरों के बंद वाली नज़्म को मुसद्दस कहते हैं.
मुसम्मन: 8-8 मिसरों के बंद वाली नज़्म को मुसम्मन कहा जाता है.

2 thoughts on “शाइरी की बातें (1): शाइरी क्या है?

  1. बेहतरीन कोशिश जो हर बाज़ौक़ इंसान के लिए ज़रूरी है क्योंकि ग़ज़ल, हज़ल, रुबाई, क़ता, मिसरा, नज़्म, नौहा, मर्सिया, मुसद्दस, बैत वगैरह वगैरह की जानकारी न होने से शायरी को उस तरह नहीं समझा जा सकता है जो समझने का हक़ है ।
    सहित्यदुनिया डॉट कॉम मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं ।मोहतरम नेहा शर्मा साहिबा की काविषों को सलामे अक़ीदत

    1. साहित्य दुनिया की पूरी टीम ने मिलकर एक प्रयास किया है. हमें ख़ुशी है कि आपको हमारी कोशिश पसंद आ रही है. धन्यवाद.

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