व्याकरण की बातें(2): “र” के विभिन्न रूप

हिन्दी वर्णमाला के 52 वर्ण, स्वर और व्यंजनों में बँटे हुए हैं। स्वर ग्यारह हैं जो मात्राओं के रूप में भी प्रयोग में आते हैं, इसी तरह व्यंजन वो वर्ण हैं जिनके उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है, आमतौर पर “अ” स्वर की। जैसे क्+अ=क उसी तरह र्+अ= र
जब व्यंजन में स्वर न जुड़ा हो तो वो आधा वर्ण भी कहलाता है और इस स्थिति में उसे “हलन्त” के साथ लिखा जाता है जैसे यदि “र” में “अ” स्वर नहीं जुड़ा हो तो हलन्त के साथ “र्” लिखा जाएगा। (इस विषय पर विस्तार में बात फिर कभी)

आज हम बात करेंगे “र” की। ये एक ऐसा विशेष व्यंजन वर्ण है, जो दूसरे व्यंजन वर्णों के साथ मात्रा के रूप में जुड़ता है और वो भी अलग-अलग तरह से।

“र” के रूप

“र” मात्रा के रूप में तीन तरह से जुड़ता है:

– रेफ़ की तरह, शिरोरेखा के ऊपर उलटे “c” के आकार में,
– पाई वाले वर्णों में नीचे बायीं ओर लगी छोटी टेढ़ी रेखा की तरह ( / )
– छोटी पाई वाले व्यंजनों में उलटे वी के आकार जैसे (^)

“र” का प्रयोग रेफ़ की तरह

जैसा हमने ऊपर बताया कि हर व्यंजन के साथ स्वर जुड़ने पर उस व्यंजन को उसका उच्चारण मिलता है.. वरना वो व्यंजन आधा होता है या उसे “स्वर रहित व्यंजन” भी कहा जाता है। तो जब स्वर रहित “र” दो वर्णों के बीच आता है तो ये अपने बाद आने वाले वर्ण के ऊपर उलटे C की आकृति की तरह मात्रा रूप में लग जाता है, इसे “रेफ़” कहते हैं।

उदाहरण- कर्म(क्+अ+र+म्+अ) इसी तरह शर्म, कार्य आदि।

याद रखने योग्य बातें:

1. रेफ़ का प्रयोग तब होता है जब “आधा र” या “स्वर रहित र” दो वर्णों के बीच हो। “स्वर रहित र” का दो अक्षरों के बीच होना ज़रूरी है।
2. रेफ़ कभी भी किसी भी शब्द के पहले अक्षर पर नहीं लगेगा।
3. रेफ़ जिस व्यंजन वर्ण पर लगेगा उससे पहले ही “र” का उच्चारण होता है, इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जिस व्यंजन वर्ण के पहले “र” का उच्चारण हो रहा हो उसी व्यंजन पर रेफ़ लगेगा।
4. अगर “स्वर रहित र” के बाद वाले व्यंजन में कोई मात्रा लगी हो तो रेफ़ उस मात्रा के पीछे जुड़कर लगेगा। जैसे: आशीर्वाद, हर्षित, जुर्माना आदि।
5. अगर “स्वर रहित र” के बाद वाला वर्ण भी स्वर रहित हो तो रेफ़ उसके बाद आने वाले वर्ण में लगता है। जैसे: अर्घ्य(अ+र्+घ्+य्+अ)
6. एक ही शब्द में दो रेफ़ का भी प्रयोग हो सकता है। जैसे: धर्मार्थ, पूर्वार्थ आदि।
7. कुछ शब्दों में “र” के ऊपर भी रेफ़ का प्रयोग होता है। जैसे: बर्र, टर्र आदि।

“र” का प्रयोग व्यंजन के नीचे

जब “स्वर सहित र” से पहले कोई “स्वर रहित वर्ण या आधा वर्ण” हो तो “र” उस वर्ण के साथ जुड़ जाता है और क्यूँकि “र” उस व्यंजन के पैर में या नीचे लगाया जाता है इसलिए इसे “पदेन” कहा जाता है।

उदाहरण- क्रम(क्+र्+अ+म्+अ), इसी तरह भ्रम, ग्राम आदि।

“र” पदेन रूप में दो तरह से लगता है:

(पाई वाले व्यंजन यानी जिन व्यंजनों के साथ एक खड़ी लाइन होती है जैसे क, ख, ग आदि और छोटी पाई वाले व्यंजन यानी जिनमें छोटी लाइन होती है जैसे ट, ठ, ड आदि। )

– जब “र” पाई वाले किसी आधे वर्ण के साथ जुड़ता है तो वो उस वर्ण के पैर में तिरछी रेखा की तरह लग जाता है। जैसे: ग्रह, ग्राम, भ्रम, भ्रमर आदि।
– जब “र” छोटी पाई वाले किसी आधे वर्ण के साथ जुड़ता है तो उस वर्ण के नीचे उलटे v के आकार में लगता है। जैसे: ट्राम, ट्रक, ड्रम, ड्रोन आदि।

याद रखने योग्य बातें:

1. पदेन रूप में या नीचे “र” तब लगता है जब वो किसी आधे वर्ण के बाद होता है।
2. ऐसे में “र” का उच्चारण उस वर्ण के बाद होता है जिसमें “र” नीचे मात्रा के रूप में लगा हो।
3. जब “र” का प्रयोग “त्” और “श्” के बाद होता है तो वो मिलकर संयुक्त अक्षर बनाते हैं। जैसे: त्+र = त्र, त्रिशूल, त्रुटि आदि। वैसे ही: श्+र= श्र, श्रम, श्रोता आदि।
4. लेकिन “र” का प्रयोग “द्” और “ह्” के साथ अलग होता है। “द्” में ये उसके नीचे ही तिरछी रेखा की तरह जुड़ता है जैसे: द्+र=द्र , द्रव्य, द्रुत आदि। और “ह्” में भी तिरछी रेखा की तरह ही जुड़ता है लेकिन अंदर की ओर, जैसे: ह्+र= ह्र, ह्रास।
5. “^” का प्रयोग ज़्यादातर “ट” और “ड” व्यंजन वर्णों के साथ होता है।
6. कुछ ऐसे शब्द भी हैं जिनमें दो पदेन का प्रयोग होता है। जैसे: प्रक्रम (प्+र+अ+क्+र+अ+म्+अ )
7. इसी तरह कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनमें एक साथ पदेन और रेफ़ का प्रयोग शब्द के एक ही वर्ण में होता है। जैसे: आर्द्र

व्याकरण का ये “कार्य” है तो आसान लेकिन “श्रम” की ज़रूरत भी है और अगर “त्रुटि” हो भी तो “शर्माना” कैसा हम है न यहाँ, आप हम पर पूरा “ट्रस्ट” कर सकते हैं।

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