व्याकरण की बातें(12): ड और ढ

व्याकरण की बातें: ड और ढ

व्याकरण की बातें” में हम अक्सर व्याकरण, मात्राओं और वर्णों के प्रयोग में होने वाली आम ग़लतियों की चर्चा करते हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि आपको हमारी इस सीरिज़ से लाभ होता होगा, वैसे इसे लिखने के दौरान कुछ नयी बातें भी हमारे सामने आती है और कई नए सवाल आ खड़े होते हैं..अब सवाल आते हैं तो जवाब भी ढूँढे जाते हैं और कुछ न कुछ नया सीखने मिलता है। ऐसा ही तो होता है न सीखने और सिखाने का क्रम.. तो चलिए आज मिलकर सीखते हैं दो ऐसे वर्णों के बारे में अक्सर जिनका प्रयोग एक-दूसरे की जगह देखने मिलता है और उससे या तो शब्द ही नहीं बनता या फिर पूरा अर्थ बदल जाता है। ये वर्ण या अक्षर हैं:

ड और ढ

ड और ढ दोनों ही वर्णमाला के “ट वर्ग” में आते हैं। वर्णमाला के वर्गों के बारे में हम आपको पहले कई बार बता चुके हैं, इसलिए अभी संक्षेप में सिर्फ़ इतना बता देते हैं कि वर्णमाला में वर्ण के कर्मों के अनुसार उन्हें पहले वर्ण के वर्ग में रखा जाता है, इसी आधार पर क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग बनाए गए हैं। आज के हमारे वर्ण “ट वर्ग” में आते हैं।
ट वर्ग- ट ठ ड ढ

इन वर्णों के प्रयोग से जुड़ी त्रुटियों से पहले हम इनके उच्चारण को जान लेते हैं। जल्द ही हम उच्चारण से जुड़े ऑडीओ और विडीओ आपको उपलब्ध करवाएँगे। पर फ़िलहाल हम अपनी पुराने तरीक़े से ही इन वर्णों के उच्चारण को जान लेते हैं।

उच्चारण

के उच्चारण के लिए आप सुन सकते हैं 1960 में आयी फ़िल्म “छलिया” का गीत “डम-डम डिगा-डिगा मौसम भीगा-भीगा”..इस गीत का शुरुआती शब्द में ही का उच्चारण है और बाद में भी।

से शुरू होने वाले शब्द: डमरू, डंडा, डाली, डोर, डगर, डगमगाना, डकार, डकैती आदि।

के उच्चारण के लिए आप सुन सकते हैं 1970 में आयी फ़िल्म “हमजोली” का गीत “ढल गया दिन हो गयी शाम”..इस गीत के पहले शब्द का पहला वर्ण है।

से शुरू होने वाले शब्द: ढक्कन, ढोल, ढपली, ढील, ढालू, ढर्रा, ढाँचा, ढोकला आदि।

अक्सर ये देखने मिलता है कि कई बार की जगह और की जगह लिख दिया जाता है, इससे कभी-कभी तो शब्द ही ग़लत होता है और उसका अर्थ ही नहीं निकलता वहीं कई बार पूरा अर्थ ही बदल जाता है।
जैसे: ठंडा को ठढा लिखना

अब कुछ ऐसे शब्द जिनमे “” की जगह “ढ” या “” की जगह “‘ का प्रयोग करने से अर्थ परिवर्तन हो जाता है। इन शब्दों के अर्थ इनके साथ लिख रहे हैं ताकि एक वर्ण से अर्थ में कितना परिवर्तन होता है ये समझा जा सके, साथ ही दोनों शब्दों को मिलाकर एक वाक्य भी नीचे बना रहे हैं जिससे अर्थ पूरी तरह स्पष्ट हो जाए:

डाल – टहनी, शाखा
ढाल– तलवार के वार को रोकने के लिए बना गोलाकार फलक
वाक्य– घने जंगल में बढ़ते हुए वो पेड़ों की डाल को अपनी ढाल से सरकाता बढ़ रहा था।

डील– क़द काठी, व्यक्तित्व
ढील– ढिलाई या शिथिलता
वाक्य– उसका डील डौल देखकर लगता मानो उसने खाने में ख़ुद को बहुत ढील दी हुई थी।

डोर– धागा
ढोर– चौपाया या मवेशी
वाक्य– अपनी डोर तुड़ाकर सारे ढोर भाग गए।

डेरा– पड़ाव
ढेरा– सुतली बटने का लकड़ी का एक औज़ार
वाक्यडेरा डालते ही रतन ढेरा निकालकर अपने काम में लग गया।

डाक– पत्र, पत्र पहुँचाने की सरकारी व्यवस्था
ढाक– पलाश
वाक्य– ऑफ़िस में आज ही डाक आयी थी और एक लिफ़ाफ़े में ढाक के पत्ते निकले।

डोल– पालकी, झूला
ढोल– एक वाद्य
वाक्य– जैसे ही वो डोल में बैठी कहीं दूर ढोल बजने लगा।

डाई– रंगाई, ठप्पा
ढाई– दो और आधा, दो से आधा अधिक
वाक्य– साड़ी में डाई का काम पूरा ही होने को था ढाई मीटर हो गया था बस बाक़ी का ढाई मीटर बाक़ी था।

डोंगी– छोटी नाव
ढोंगी– पाखंडी
वाक्यडोंगी में बैठते ही ढोंगी ने किनारे पहुँचकर लोगों को छलने की योजना बनानी शुरू कर दी।

डालना– गिराना
ढालना– साँचे में बाँधना, रूप बदलना
वाक्य– गरम शीशे को साँचे में डालना और अपने पसंद के आकार में ढालना आसान है लेकिन जीवन को सही रूप में ढालना कठिन है।

यहाँ हम ये भी बताते चलें कि ड और ढ से बहुत मिलते जुलते दो वर्ण और हैं ड़ और ढ़ इनसे शुरू होने वाले कोई शब्द नहीं हैं लेकिन ये कई शब्दों में इस्तेमाल होते हैं।

ड़ वाले कुछ शब्द हैं: कड़ा, बड़ा, लड़, जड़, लड़का, लड़की आदि
ढ़ वाले कुछ शब्द हैं: गाढ़ा, कढ़ी, बढ़ना, पढ़ना, गढ़ना आदि

इनके आपस में बदल जाने से भी कुछ शब्दों का अर्थ बदलता है।
जैसे: पढ़ना- पड़ना
कढ़ाई- कड़ाई

आशा है आप आज की इस पोस्ट पर नज़र डालेंगे। इसे पढ़ने में ज़्यादा वक़्त तो नहीं लगेगा शायद ढाई से तीन मिनट या थोड़ा ज़्यादा, लेकिन अगर सीखने के लिए कमर कसके डेरा डाल दें तो व्याकरण की एक डोर आपको ख़ुद से बाँध लेगी। लेकिन किसी भी चीज़ को सीखने के लिए ढोल बजाने से ज़्यादा ज़रूरी है ख़ुद को सीखने की क्रिया में ढालना और बस फिर आप ज़रूर सफल होंगें लेकिन मेहनत कम हुई तो ढाक के तीन पात ही रह जाएँगे लेकिन हमें आप पर पूरा भरोसा है।

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