शाइरी की बातें(15): नामौज़ूंनियत, सुस्त बंदिश, बलाग़त और फ़साहत

आज हम आपको ‘शाइरी की बातें’ में चार ऐसे बिन्दुओं के बारे में बता रहे हैं जिसको जानना बेहद ज़रूरी है. इन्हें जानकार ही आपकी शा’इरी और बेहतर हो सकती है-
नामौज़ूंनियत: नामौज़ूंनियत शब्द का अर्थ है कि किसी शेर का मौज़ूं ना होना. ऐसा माना जाता है कि कोई मिसरा या शेर दो तरह से नामौज़ूं हो सकता है. एक तो ये कि वो अपनी निश्चित बह्र से गिर जाए, इसे सकता भी कहा जाता है. एक और तरह से शेर नामौज़ूं हो सकता है वो ये कि जब किसी स्वर को ऐसी अवस्था में गिराया जा रहा है जब कि काव्य-शास्त्र इसकी अनुमाती नहीं देता है, तब भी शेर नामौज़ूं हो जाएगा.

सुस्त बंदिश: ये परेशानी अक्सर नए लोगों के साथ होती है, जब किसी शेर के वज़्न को पूरा करने के लिए बहुत से “कि”,”ये”,”तो”,”भी”,”पर” आदि का प्रयोग किया जाता है तो शेर में चुस्ती कम हो जाती है, ऐसे में इसे सुस्त बंदिश कहेंगे.

बलाग़त: बलाग़त का मतलब है कि सारे शब्द किसी शेर में इस तरह गढ़े हों कि एक भी शब्द ग़ैर-ज़रूरी ना हो, सब ध्वनि, प्रवाह और अर्थ के हिसाब से बिलकुल अच्छी तरह से जुड़े हों. बलाग़त के लिए अभ्यास बहुत ज़रूरी है, जितना अधिक अभ्यास होगा उतना ही ये गुण मज़बूत होगा.

फ़साहत: फ़साहत का मतलब है कि कविता में कोई भी ऐसा शब्द ना हो जो नियमों के मुताबिक़ ग़लत हो. दोषहीन शेर को फ़सीह शेर कहा जाता है, ग़ज़लों में भारी भरकम शब्दों के इस्तेमाल से फ़साहत ख़त्म हो जाती है. ग़लत तरह से किसी शब्द का इस्तेमाल शेर को ग़ैर-फ़सीह बना देता है.

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