दो कहानीकार, दो कहानियाँ (4): जयशंकर प्रसाद और परसाई

जयशंकर प्रसाद की कहानी: कलावती की शिक्षा

श्यामसुंदर ने विरक्त होकर कहा- “कला! यह मुझे नहीं अच्छा लगता।”

कलावती ने लैम्प की बत्ती कम करते हुए सिर झुकाकर तिरछी चितवन से देखते हुए कहा- “फिर मुझे भी सोने के समय यह रोशनी अच्छी नहीं लगती”

श्यामसुंदर ने कहा- “तुम्हारा पलँग तो इस रोशनी से बचा है, तुम जाकर सो रहो।”

“और तुम रात भर यूँ ही जागते रहोगे”

अब की कलावती ने हाथ से पुस्तक भी खींच ली। श्यामसुंदर को इस स्नेह में भी क्रोध आ गया। तिनक गए- “तुम पढ़ने का सुख नहीं जानती, इसलिए तुमको समझाना ही मूर्खता है।”

कलावती ने प्रगल्भ होकर कहा- “मूर्ख बनकर थोड़ा समझा दो।”

श्यामसुंदर भड़क उठे, उनकी शिक्षिता उपन्यास की नायिका उसी अध्याय में अपने प्रणयी के सामने आयी थी, वह आगे बातचीत करती; उसी समय ऐसा व्याघात। ‘स्त्रीणामाद्य प्रणय वचनम्’ कालिदास ने भी इसे नहीं छोड़ा था। कैसा अमूल्य पदार्थ! अशिक्षिता कलावती ने वहीं रस भंग किया। बिगड़कर बोले- “वह तुम इस जन्म में नहीं समझोगी।”

कलावती ने और भी हँसकर कहा- “देखो, उस जन्म में भी ऐसा बहाना न करना।”

पुष्पाधार में धरे हुए नरगिस के गुच्छे ने अपनी ओर एकटक देखती आँखों से चुपचाप यह दृश्य देखा और वह कालिदास के तात्पर्य को बिगाड़ते हुए श्यामसुंदर की धृष्टता न सहन कर सका और शेष ‘विभ्रमोहि प्रयेषु’ का पाठ हिलकर करने लगा।

श्यामसुंदर ने लैम्प की बत्ती चढ़ायी, फिर अध्ययन आरम्भ हुआ। कलावती अब अपने पलँग पर जा बैठी। डब्बा खोलकर पान लगाया, दो खीली लेकर फिर श्यामसुंदर के पास आयी।

श्याम ने कहा- “रख दो”

खीलीवाला हाथ मुँह की ओर बढ़ा, कुछ मुख भी बढ़ा, पान उसमें चला गया। कलावती फिर लौटी और एक चीनी की पुतली लेकर उसे पढ़ाने बैठी- “देखो, मैं तुम्हें दो-चार बातें सिखाती हूँ, उन्हें अच्छी तरह रट लेना। लज्जा कभी न करना, यह पुरुषों की चालाकी है, जो उन्होंने स्त्रियों के हिस्से कर दिया है। यह दूसरे शब्दों में एक प्रकार का भ्रम है, इसीलिए तुम ऐसा रूप धारण करना कि पुरुष, जो बाहर से अनुकम्पा करते हुए भी तुमसे भीतर-भीतर घृणा करते हैं, वह तुमसे भयभीत रहें, तुम्हारे पास आने का साहस न करें, और कृतज्ञ होना दासत्व है। चतुरों ने अपना कार्य साधन करने का अस्त्र इसे बनाया है, इसीलिए इसकी प्रशंसा की है कि लोग इसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं, किन्तु है यह दासत्व। यह शरीर का नहीं, किन्तु अन्तरात्मा का दासत्व है, इस कारण कभी-कभी लोग बुरी बातों का भी समर्थन करते हैं। प्रगल्भता, जो आजकल बड़ी बाढ़ पर है, बड़ी अच्छी वस्तु है। उसके बल से मूर्ख भी पण्डित समझे जाते हैं। उसका अच्छा अभ्यास करना, जिससे तुमको कोई मूर्ख न कह सके, कहने का साहस ही न हो। पुतली! तुमने रूप का परिवर्तन भी छोड़ दिया है, यह और भी बुरा है। सोने के कोर की साड़ी तुम्हारे मस्तक को अभी भी ढँके है, तनिक इसे खिसका दो। बालों को लहरा दो, लोग लगें पैर चूमने, प्यारी पुतली! समझी न?”

श्यामसुंदर के उपन्यास की नायिका भी अपने नायक के गले लग गयी थी, प्रसन्नता से उसका मुख-मण्डल चमकने लगा। वो अपना आनन्द छिपा नहीं सकता था। पुतली की शिक्षा उसने सुनी कि नहीं, हम नहीं कह सकते, किन्तु वह हँसने लगा। कलावती को क्या सूझा, लो वह तो सचमुच उसके गले लगी हुई थी। अध्याय समाप्त हुआ, पुतली को अपना पाठ याद रहा कि नहीं, लैम्प के धीमे प्रकाश में कुछ समझ न पड़ा।

*समाप्त*
…..

हरिशंकर परसाई की कहानी: अश्लील

शहर में ऐसा शोर था कि अश्लील साहित्य का बहुत प्रचार हो रहा है। अख़बारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्लील पुस्तकें बिक रहीं हैं।

दस-बारह समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनायी और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्य को छीन लेंगे और और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।

उन्होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीस-पच्चीस अश्लील पुस्तकें हाथों में कीं। हरेक के पास दो या तीन किताबें थीं।

मुखिया ने कहा- “आज तो देर हो गयी, कल शाम को अख़बार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्थान में इन्हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो, पुस्तकें मैं इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता, बीस-पच्चीस हैं, पिताजी और चाचाजी हैं, देख लेंगे तो आफ़त हो जाएगी । ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को लेते आना।”

दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था।

मुखिया ने कहा- “किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।”

किताब कोई लाया नहीं था।

एक ने कहा – “कल नहीं परसों जलाना, पढ़ तो लें।”

दूसरे ने कहा- “अभी हम पढ़ रहे हैं, किताबों को दो-तीन दिन बाद जला देना, अब तो किताबें ज़ब्त ही कर लीं”

उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ। तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।

एक ने कहा- “अरे यार फ़ादर के हाथ किताबें पड़ गयीं, वो पढ़ रहे हैं।”

दूसरे ने कहा- “अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा।”

तीसरे ने कहा- “भाभी उठाकर ले गयीं, बोली कि दो-तीन दिन में पढ़कर वापस कर दूँगी।”

चौथे ने कहा- “अरे, पड़ोस की चाची मेरी ग़ैरहाज़िरी में उठा ले गयीं, पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।”

अश्लील पुस्तकें कभी नहीं जलायीं गयीं, वे अब व्यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।

*समाप्त*

[फ़ोटो क्रेडिट(फ़ीचर्ड इमेज): प्रियंका शर्मा]

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