दो कहानीकार, दो कहानियाँ (5): सुभद्रा कुमारी चौहान और ख़लील जिब्रान

सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानी: जम्बक की डिबिया

“इस जम्बक की डिबिया से मैंने एक आदमी का ख़ून जो कर डाला है, इसलिए मैं इससे डरता हूँ। मैं जानता हूँ कि यही जम्बक की डिबिया मेरी मौत का कारण होगी”- प्रोफ़ेसर साहब ने कहा और कुर्सी पर टिक गए। उसके बाद हम सभी लोगों ने उनसे पूछा- “जम्बक की डिबिया से मनुष्य की हत्या आख़िर हो ही कैसे सकती है?”

सिगरेट बुझाकर ऐश-ट्रे पर फेंकते हुए प्रोफ़ेसर साहब ने कहा- “बात उन दिनों की है, जब मैं बी.ए. फ़ाइनल में पढ़ता था। केठानी हमारे घर का पुराना नौकर था, बड़ा मेहनती, बड़ा ईमानदार। महीनों हमारी माँ जब घर के बाहर रहती थीं, वह सारे घर की देखभाल करता था। एक चीज़ भी कभी इधर से उधर न हुई थी। एक बार यही बरसात के दिन थे, मेरी छोटी बहन के शरीर पर लाल-लाल दाने से उठ आए थे और उसके लिए मैं एक जम्बक की डिबिया ख़रीद लाया। मेरी माँ मशीन के सामने बैठी कपड़े सी रही थी। आसपास बहुत से कपड़े पड़े थे। वहीं मैंने वह डिब्बी खोली। बहन के दानों पर जहाँ-तहाँ लगाया और डिब्बी माँ के हाथ में दे दी। पास ही केठानी खड़ा-खड़ा धुले हुए कपड़ों की तह लगा रह था। जब मैं बहन के दानों पर जम्बक लगा चुका था तब केठानी ने उत्सुकता से पूछा- “काय भैया! ई से ई सब अच्छो हुई जईहैं?”

मैंने कहा- “हाँ, खाज, फोड़ा, फुंसी, जले-कटे सब जगह यह दवा काम आती है। इसके बाद केठानी अपने काम में लग गया और मैं बाहर चला गया।”

शाम को जब मैं घूमकर लौटा तो देखा घर में एक अजीब प्रकार की चहल-पहल है, माँ कह रही थीं- “बिना देखे कैसे किसी को कुछ कहा जा सकता है, कहाँ गयी कौन जाने?”

बड़ी बहन कह रही थी- “उसे छोड़कर और ले ही कौन सकता है? कल उसकी भावज आयी थी न, उसके लड़के के सिर में भी बहुत सारी फुंसियाँ थी”

पिताजी कह रहे थे- “कहीं महाराजिन न ले गयी हो। अखिल उससे कह रहा था यह गोरे होने की दवा है, लड़के भी तो तुम्हारे सीधे नहीं हैं।”

पास ही बैठा अखिल पढ़ रहा था। पिताजी की बात में दिलचस्पी लेते हुए वह बोला – “बापू महाराजिन तो हमेशा गोरे होने की ही फ़िक्र में रहती है फिर मुझसे पूछा कि यह क्या है, सो मैंने भी कह दिया कि गोरे होने की दवा है”

केठानी अपनी कोठरी में रोटी बना रहा था। उसे बुलाकर पूछा गया तो उसने कहा- “जब भैया लगाई हती आपने तो तबै देखी रही, फिर हम नहीं देखन सरकार”

मुझे क्रोध आ गया, बोला- “तो डिबिया पंख लगाकर उड़ गयी? केठानी मेरी तरफ़ देखा बोला- “भैया…”
मैंने कहा- “चुप हो! मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। सुबह मैं डिब्बी लाया और इस समय ग़ायब हो गयी। यह सब तुम लोगों की बदमाशी है”

केठानी कुछ न बोला वहीं खड़ा रहा और मैं अपने कमरे में चला गया। मैंने सुना वह माँ से कह रहा था- “मालकिन चल के मोर कोठरी खोली देख लेई, मैं का करिहौं दवाई ले जाई के? फिर जऊन चीज लागी मैं माँग न लईहौं सरकार से?”

मैं कोट उतार रहा था, न जाने मुझे क्यों क्रोध आ गया और मैं कमरे से निकलकर बोला- “चले जाओ अपना हिसाब लेकर, हमें तुम्हारी ज़रूरत नहीं है- आख़िर माँ ने बहुत समझाया पर हम सब भाई-बहन न माने और माँ ने केठानी को बहुत रोकना चाहा और वह यही कहता रहा- जब तक भैया माफ़ न कर देंगे, अपने मुँह से मुझसे रुकने को न कहेंगे, मैं न रहूँगा।”

और मैंने न केठानी को रुकने को कहा, न वो रुका। हमारे घर की नौकरी छोड़कर वह चला गया, पर घर के सब लोगों को वह प्यार करता था। वह गया ज़रूर पर तन से गया मन से नहीं, माँ को भी उसका अभाव बहुत खटका और मुझे तो सबसे ज़्यादा उसका अभाव खटका। वह मेरे कमरे को साफ़ रखता था सजाकर रखता था, फूलों का गुलदस्ता नियम से बनाकर रखता था। मेरी ज़रूरतें बिना बताए समझ जाता और पूरी करता था। पर ज़िद्दी स्वभाव के कारण चाहते हुए भी मैं माँ से कह न सका कि केठानी को बुला लो जो कि मैं हृदय से चाहता था।

एक दिन माँ ने कहा कि केठानी रायसाहब के बंगले पर गारा-मिट्टी का काम करता है। मैंने सुना , मेरे दिल पर ठेस लगी। बूढ़ा आदमी, डगमग पैर, भला वह गारा-मिट्टी का काम कैसे कर सकेगा? फिर भी चाहा कि यदि माँ कहे कि केठानी को बुला लेती हूँ तो मैं इस बार ज़रूर कह दूँगा कि हाँ बुला लो। पर इस बार माँ ने केवल उसके गारा-मिट्टी ढोने की ख़बर भर दी और उसे फिर से नौकर रखने का प्रस्ताव न किया।

एक दिन मैं कॉलेज जा रहा था। देखा केठानी सिर पर गारे का तसला रखे चाली पर से कारीगरों को दे रहा है। चालीस फ़ुट ऊपर चाली पर चढ़ा हुआ बूढ़ा केठानी, खड़ा काम कर रहा था। मेरी अंतरात्मा ने मुझे काटा। यह सब मेरे कारण है और मैंने निश्चय कर लिया कि शाम को लौटकर माँ से कहूँगा अब केठानी को बुला लो। वह बहुत बूढ़ा कमज़ोर हो गया है। इतनी कड़ी सज़ा उसे न मिलनी चाहिए। दिन भर मुझे उसका ख़याल बना रहा। शाम ज़रा जल्दी लौटा, रास्ते पर ही राय साहब का घर था, मज़दूरों में विशेष प्रकार की हलचल थी। सुना कि एक मज़दूर चाली पर से गिरकर मर गया। पास जाकर देखा वह केठानी था। मेरा हृदय एक आदमी की हत्या के बोझ से बोझिल हो उठा। घर आकर माँ से सब कुछ कहा- “माँ, उसके कफ़न के लिए कोई नया कपड़ा निकाल दो!”

माँ अपने सिलाई वाली पोटली उठा लायीं। नया कपड़ा निकालने के लिए उन्होंने ज्यों ही पोटली खोली जम्बक की डिबिया खट से गिर पड़ी।

समाप्त

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ख़लील जिब्रान की कहानी: दूसरी भाषा

मुझे पैदा हुए अभी तीन ही दिन हुए थे और मैं रेशमी झूले में पड़ा अपने आसपास के संसार को बड़ी अचरज भरी निगाहों से देख रहा था। तभी मेरी माँ ने आया से पूछा, “कैसा है मेरा बच्चा?”

आया ने उत्तर दिया, “वह ख़ूब मज़े में है, मैं उसे अब तक तीन बार दूध पिला चुकी हूँ। मैंने इतना ख़ुशदिल बच्चा आज तक नहीं देखा।”

मुझे उसकी बात पर बहुत ग़ुस्सा आया और मैं चिल्लाने लगा, “माँ यह सच नहीं कह रही है, मेरा बिस्तर बहुत ही सख़्त है और जो दूध इसने मुझे पिलाया है वह बहुत ही कड़वा था और इसके पास से भयंकर दुर्गन्ध आ रही है, मैं बहुत दुखी हूँ।”

परंतु न तो मेरी माँ को मेरी बात समझ में आयी और न ही उस आया को; क्योंकि मैं जिस भाषा में बात कर रहा था ह तो उस दुनिया की भाषा थी जिस दुनिया से मैं आया था।”

और जब मैं इक्कीस दिन का हुआ और मेरा नामकरण किया गया, तो पादरी ने मेरी माँ से कहा, “आपको तो बहुत ख़ुश होना चाहिए, क्यूँकि आपके बेटे का तो जन्म ही एक ईसाई के रूप में हुआ है।”

मैं इस बात पर बहुत आश्चर्यचकित हुआ। मैंने उस पादरी से कहा, “तब तो स्वर्ग में तुम्हारी माँ को बहुत दुखी होना चाहिए, क्यूँकि तुम्हारा जन्म एक ईसाई के रूप में नहीं हुआ था।”

किंतु पादरी भी मेरी बात नहीं समझ सका।

फिर सात साल के बाद एक ज्योतिषी ने मुझे देखकर मेरी माँ को बताया, “तुम्हारा पुत्र एक राजनेता बनेगा और लोगों का नेतृत्व करेगा।”

परंतु मैं चिल्ला उठा, “यह भविष्यवाणी ग़लत है, क्यूँकि मैं तो संगीतकार बनूँगा। कुछ और नहीं, केवल एक संगीतकार।”

किंतु मेरी उम्र में किसी ने मेरी बात को गम्भीरता से नहीं लिया, मुझे इस बात पर बहुत हैरानी हुई।

तैंतीस वर्ष बाद मेरी माँ, मेरी आया और उस पादरी सबका स्वर्गवास हो चुका है, (ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे) किंतु वह ज्योतिषी अभी जीवित है। कल मैं उस ज्योतिषी से मंदिर के द्वार पर मिला। जब हम बातचीत कर रहे थे, तो उसने कहा, “मैं शुरू से जानता था कि तुम एक महान संगीतकार बनोगे, मैंने तुम्हारे बचपन में ही यह भविष्यवाणी कर दी थी। तुम्हारी माँ को भी तुम्हारे भविष्य के बारे में उसी समय बता दिया था।”

और मैंने उसकी बात का विश्वास कर लिया क्योंकि अब तक तो मैं स्वयं भी उस दुनिया की भाषा भूल चुका था।

समाप्त

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फ़ोटो क्रेडिट (फ़ीचर्ड इमेज): मैरी कास्सत्त की सन 1880 की पेंटिंग “मदर एंड चाइल्ड”

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