दो शा’इर दो रूबाई (10): शाद अज़ीमाबादी और जोश मलीहाबादी

शाद अज़ीमाबादी की रूबाई

सौ तरह का मेरे लिए सामान क्या
पूरा इक उम्र का अरमान क्या
सय्यद से मिला प मदरसा भी देखा
‘हाली’ ने अजब तरह का एहसान किया

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जोश मलीहाबादी की रूबाई

साहिल, शबनम, नसीम, मैदान-ए-तुयूर
ये रंग ये झूठ-पुटा ये ख़ुनकी ये सुरूर
ये रक़्स-ए-हयात और दरिया के उधर
टूटी हुई क़ब्रों पे सितारों का ये नूर

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रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है

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