दो शा’इर, दो रूबाई(2) : सादिक़ैन और इस्माइल मेरठी..

सादिक़ैन की रूबाई

बचपन में तुझे याद किया था मैंने,
जब शे’र का कब लफ़्ज़ सुना था मैंने,
इस पर नहीं मौक़ूफ़ रुबाई तुझ को
हर रोज़ ही तख़्ती पे लिखा था मैंने

(मौक़ूफ़- निर्भर)

नोट- 1923 में पैदा हुए सादिक़ैन पाकिस्तान के इतिहास के सबसे शानदार पेंटर और कैलीग्राफ़र माने जाते हैं. वो एक शा’इर भी थे, बतौर शा’इर उन्होंने उमर खै़य्याम और सरमद कशानी के स्टाइल में रूबाईयाँ लिखी हैं. 10 फ़रवरी, 1987 को उनकी मृत्यु हो गयी.

इस्माइल मेरठी की रूबाई

देखा तो कहीं नज़र ना आया हरगिज़,
ढूँडा तो कहीं पता ना पाया हरगिज़,
खोना पाना है सब फ़ुज़ूली अपनी
ये ख़ब्त न हो मुझे ख़ुदाया हरगिज़

(ख़ब्त- पागलपन)

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रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है.

फ़ीचर्ड इमेज- सोफ़ी दे बौतेइल्लेर(1829-1901) फ़्रांसीसी पेंटर थीं. वो हेनरीइत्ते ब्राउन नाम से पेंटिंग करती थीं.साहित्य दुनिया द्वारा इस पोस्ट में इस्तेमाल की गयी फ़ीचर्ड इमेज उन्हीं की मशहूर पेंटिंग एन्फंत एक्रिवंत (Enfant écrivant) जिसका हिंदी में अर्थ “बच्चे का लेखन” है. फ़िलहाल ये पेंटिंग लन्दन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम में है.

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