दो शा’इर, दो रूबाई (1): मीर अनीस और अख़्तर अंसारी…

आज हम साहित्य दुनिया में रूबाई की सीरीज़ शुरू कर रहे हैं. दो शा’इर, दो रूबाई सीरीज़ में आज हम मर्सिया और रूबाई के महान शा’इर और उर्दू शा’इरी का शेक्सपियर कहलाये जाने वाले मीर अनीस की एक रूबाई पेश कर रहे हैं. उनके साथ अख़्तर अंसारी की भी एक रूबाई हम पाठकों से साझा कर रहे हैं.

मीर अनीस की रूबाई

अंदाज़-ए-सुख़न तुम जो हमारे समझो,
जो लुत्फ़-ए-कलाम हैं वो सारे समझो,
आवाज़ गिरफ़्ता गो है उस ज़ाकिर की,
पहरों रोओ अगर इशारे समझो

अख़्तर अंसारी की रूबाई

इक तीर कलेजे में पिरोया हमने
इक ज़ख़्म दिल-ए-ज़ार में बोया हमने
लूटा किए फिर उम्र भर आहों के मज़े
यूँ जन्नत-ओ-दोज़ख़ को समोया हमने

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रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है.

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