दो शा’इर दो रूबाई (5): ग़ालिब और फ़िराक़..

मिर्ज़ा ग़ालिब की रूबाई

कहते हैं कि अब वो मर्दम-आज़ार नहीं
उशशाक़ की पुरसिश से उसे आर नहीं
जो हाथ कि ज़ुल्म से उठाया होगा
क्यूँकर मानूँ कि उसमें तलवार नहीं

(मर्दम-आज़ार: इंसानों को सताने वाला,उशशाक़- प्रेमियों, पुरसिश- पूछताछ, आर- अनबन)

नोट- मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के सबसे महान शा’इरों में शुमार किये जाते हैं. असद उल्लाह ख़ा “ग़ालिब” का जन्म 27 दिसंबर, 1796 को उत्तर प्रदेश के
आगरा शहर में हुआ था. उनका देहांत 15 फ़रवरी 1869 को दिल्ली में हुआ.

……
फ़िराक़ गोरखपुरी की रूबाई

चढ़ती हुई नद्दी है कि लहराती है
पिघली हुई बिजली है कि बल खाती है
पहलू में लहक के भेंच लेती है वो जब
क्या जाने कहाँ बहा ले जाती है

नोट- रघुपति सहाय “फ़िराक़” गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को हुआ था. वो अपने दौर के सबसे कामयाब शा’इरों में से एक थे. उनका देहांत 3 मार्च, 1982 को दिल्ली में हुआ.

रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है.

फ़ीचर्ड इमेज: ये पेंटिंग किसी अज्ञात पेंटर ने बनायी है. इस पेंटिंग का नाम “Landscape from the Alps with a river and mountains in the background” है. इसे 1883 में बनाया गया था.

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