दो शा’इर, दो ग़ज़लें सीरीज़ (11): फै़ज़ अहमद फै़ज़ और असग़र गोंडवी…

फै़ज़ अहमद फै़ज़ की ग़ज़ल-हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए

हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए
काफ़िरों की नमाज़ हो जाए

मिन्नत-ए-चारा-साज़ कौन करे,
दर्द जब जाँ-नवाज़ हो जाए

इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो
लब पे आए तो राज़ हो जाए

लुत्फ़ का इंतिज़ार करता हूँ
जौर ता हद्द-ए-नाज़ हो जाए

उम्र बे-सूद कट रही है ‘फ़ैज़’
काश इफ़शा-ए-राज़ हो जाए

[रदीफ़- हो जाए]
[क़ाफ़िए- मजाज़, नमाज़, नवाज़, राज़, नाज़, राज़]

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असग़र गोंडवी की ग़ज़ल: जान-ए-नशात हुस्न की दुनिया कहें जिसे

जान-ए-नशात हुस्न की दुनिया कहें जिसे,
जन्नत है एक ख़ून-ए-तमन्ना कहें जिसे

उस जल्वा-गाह-ए-हुस्न में छाया है हर तरफ़,
ऐसा हिजाब चश्म-ए-तमाशा कहें जिसे

ये असल ज़िंदगी है ये जान-ए-हयात है,
हुस्न-ए-मज़ाक़ शोरिश-ए-सौदा कहें जिसे

अक्सर रहा है हुस्न-ए-हक़ीक़त भी सामने,
इक मुस्तक़िल सराब-ए-तमन्ना कहें जिसे

ज़िंदानियों को आ के न छेड़ा करे बहुत
जान-ए-बहार निकहत-ए-रुस्वा कहें जिसे

इस हौल-ए-दिल से गर्म-रौ-ए-अरसा-ए-वजूद
मेरा ही कुछ ग़ुबार है दुनिया कहें जिसे

शायद मिरे सिवा कोई उस को समझ सके
वो रब्त-ए-ख़ास रंजिश-ए-बेजा कहें जिसे

‘असग़र’ न खोलना किसी हिकमत-मआब पर
राज़-ए-हयात साग़र ओ मीना कहें जिसे

[रदीफ़- कहें जिसे]
[क़ाफ़िए- दुनिया, तमन्ना, तमाशा, सौदा, तमन्ना, रुस्वा, दुनिया, बेजा, मीना]
*दोनों ग़ज़लों का पहला शे’र मतला है. मत’ला उस शे’र को कहते हैं जिसके दोनों मिसरों में रदीफ़-क़ाफ़िए की पाबंदी हो.

*फ़ोटो क्रेडिट (फ़ीचर्ड इमेज)- नेहा शर्मा 

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