दो शाइर, दो नज़्में(11): हबीब जालिब और नून मीम राशिद

हबीब जालिब की नज़्म- औरत

बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया
दीवार है वो अब तक जिस में तुझे चुनवाया

दीवार को आ तोड़ें बाज़ार को आ ढाएँ
इंसाफ़ की ख़ातिर हम सड़कों पे निकल आएँ
मजबूर के सर पर है शाही का वही साया
बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया

तक़दीर के क़दमों पर सर रख के पड़े रहना
ताईद-ए-सितमगर है चुप रह के सितम सहना
हक़ जिस ने नहीं छीना हक़ उस ने कहाँ पाया
बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया

कुटिया में तिरा पीछा ग़ुर्बत ने नहीं छोड़ा
और महल-सरा में भी ज़रदार ने दिल तोड़ा
उफ़ तुझ पे ज़माने ने क्या क्या न सितम ढाया
बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया

तू आग में ऐ औरत ज़िंदा भी जली बरसों
साँचे में हर इक ग़म के चुप-चाप ढली बरसों
तुझ को कभी जलवाया तुझ को कभी गड़वाया
बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया

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नून मीम राशिद की नज़्म: एक दिन लारेंस बाग़ में

बैठा हुआ हूँ सुब्ह से लॉरेंस-बाग़ में
अफ़्कार का हुजूम है मेरे दिमाग़ में
छाया हुआ है चार तरफ़ बाग़ में सुकूत
तन्हाइयों की गोद में लेटा हुआ हूँ मैं
अश्जार बार बार डराते हैं बन के भूत
जब देखता हूँ उन की तरफ़ काँपता हूँ मैं
बैठा हुआ हूँ सुब्ह से लॉरेंस-बाग़ में

लॉरेंस-बाग़ कैफ़ ओ लताफ़त के ख़ुल्द-ज़ार
वो मौसम-ए-नशात वो अय्याम-ए-नौ-बहार
भूले हुए मनाज़िर-ए-रंगीं बहार के
अफ़्कार बन के रूह में मेरी उतर गए
वो मस्त गीत मौसम-ए-इशरत-फ़िशार के
गहराइयों को दिल की ग़म आबाद कर गए
लॉरेंस-बाग़ कैफ़ ओ लताफ़त के ख़ुल्द-ज़ार

है आसमाँ पे काली घटाओं का इज़्दिहाम
होने लगी है वक़्त से पहले ही आज शाम
दुनिया की आँख नींद से जिस वक़्त झुक गई
जब काएनात खो गई असरार-ए-ख़्वाब में
सीने में जू-ए-अश्क है मेरे रुकी हुई
जा कर उसे बहाऊँगा कुंज-ए-गुलाब में
है आसमाँ पे काली घटाओं का इज़्दिहाम
अफ़्कार का हुजूम है मेरे दिमाग़ में
बैठा हुआ हूँ सुब्ह से लॉरेंस-बाग़ में

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