दो शा’इर, दो नज़्में (1): परवीन शाकिर और सरदार जाफ़री…

साहित्य दुनिया में हम आज ‘दो शा’इर, दो नज़्में’ सीरीज़ शुरू’अ कर रहे हैं.आज हम परवीन शाकिर की नज़्म “ख्व़ाब” और अली सरदार जाफ़री की नज़्म “एक बात” आपके सामने पेश कर रहे हैं.

परवीन शाकिर की नज़्म: ख्व़ाब

खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ,
नर्म लहरों के छीॅंटे उड़ाती हुई,
बात बे बात हँसती हुई,
अपने ख़्वाबों के शहज़ादों का तज़्किरा कर रही थीं
जो ख़ामोश थीं
उनकी आँखों में भी मुस्कुराहट की तहरीर थी
उनके होंटों को भी अन-कहे ख़्वाब का ज़ाइक़ा चूमता था!
आने वाले नए मौसमों के सभी पैरहन नीलमीं हो चुके थे!
दूर साहिल पे बैठी हुई एक नन्ही सी बच्ची
हमारी हँसी और मौजों के आहंग से बेख़बर
रेत से एक नन्हा घरौंदा बनाने में मसरूफ़ थी
और मैं सोचती थी
ख़ुदाया! ये हम लड़कियाँ
कच्ची उम्रों से ही ख़्वाब क्यूँ देखना चाहती हैं
ख़्वाब की हुक्मरानी में कितना तसलसुल रहा है..

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अली सरदार जाफ़री की नज़्म- एक बात

इस पे भूले हो कि हर दिल को कुचल डाला है,
इस पे भूले हो कि हर गुल को मसल डाला है,
और हर गोशा-ए-गुलज़ार में सन्नाटा है

किसी सीने में मगर एक फ़ुग़ाँ तो होगी
आज वो कुछ न सही कल को जवाँ तो होगी

वो जवाँ हो के अगर शोला-ए-जव्वाला बनी
वो जवाँ हो के अगर आतिश-ए-सद-साला बनी
ख़ुद ही सोचो कि सितम-गारों पे क्या गुज़रेगी

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*फ़ोटो क्रेडिट (फ़ीचर्ड इमेज)- नेहा शर्मा

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