दो शाइर, दो नज़्में(7): परवीन शाकिर और फ़हमीदा रियाज़

परवीन शाकिर की नज़्म: नहीं मेरा आँचल मैला है

नहीं मेरा आँचल मैला है
और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं
किसी हवा ने इनको अब तक छूने की जुरअत नहीं की है
तेरी उजली पेशानी पर
गए दिनों की कोई घड़ी
पछतावा बन के नहीं फूटी
और मेरे माथे की सियाही
तुझ से आँख मिला कर बात नहीं कर सकती
अच्छे लड़के
मुझे न ऐसे देख
अपने सारे जुगनू सारे फूल
सँभाल के रख ले
फटे हुए आँचल से फूल गिर जाते हैं
और जुगनू
पहला मौक़ा पाते ही उड़ जाते हैं
चाहे ओढ़नी से बाहर की धूप कितनी ही कड़ी हो!

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फ़हमीदा रियाज़ की नज़्म: पत्थर की ज़बान

इसी अकेले पहाड़ पर तू मुझे मिला था
यही बुलंदी है वस्ल तेरा
यही है पत्थर मिरी वफ़ा का
उजाड़ चटयल उदास वीराँ
मगर मैं सदियों से, इस से लिपटी हुई खड़ी हूँ
फटी हुई ओढ़नी में साँसें तिरी समेटे
हवा के वहशी बहाओ पर उड़ रहा है दामन
सँभाला लेती हूँ पत्थरों को गले लगा कर
नुकीले पत्थर
जो वक़्त के साथ मेरे सीने में इतने गहरे उतर गए हैं
कि मेरे जीते लहू से सब आस पास रंगीन हो गया है
मगर मैं सदियों से इस से लिपटी हुई खड़ी हूँ
और एक ऊँची उड़ान वाले परिंद के हाथ
तुझ को पैग़ाम भेजती हूँ
तू आ के देखे
तो कितना ख़ुश हो
कि संग-रेज़े तमाम याक़ूत बन गए हैं
दमक रहे हैं
गुलाब पत्थर से उग रहा है

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