दो शा’इर, दो ग़ज़लें (18): कैफ़ी आज़मी और अल्लामा इक़बाल

कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल: हाथ आ कर लगा गया कोई

हाथ आ कर लगा गया कोई,
मेरा छप्पर उठा गया कोई

लग गया इक मशीन में मैं भी
शहर में ले के आ गया कोई

मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई

ये सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई

ऐसी महँगाई है कि चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई

अब वो अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई

वो गए जब से ऐसा लगता है
छोटा मोटा ख़ुदा गया कोई

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई

रदीफ़: गया कोई
क़वाफ़ी: लगा, उठा, आ, लगा, खा, उड़ा, ख़ुदा, आ
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अल्लामा इक़बाल की ग़ज़ल: अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा

अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमां तेरा है या मेरा,
मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहां तेरा है या मेरा

अगर हंगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली,
ख़ता किस की है या रब ला-मकां तेरा है या मेरा

उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर,
मुझे मालूम क्या वो राज़-दां तेरा है या मेरा

मोहम्मद भी तिरा जिबरील भी क़ुरआन भी तेरा,
मगर ये हर्फ़-ए-शीरीं तर्जुमां तेरा है या मेरा

इसी कौकब की ताबानी से है तेरा जहाँ रौशन,
ज़वाल-ए-आदम-ए-ख़ाकी ज़ियाँ तेरा है या मेरा

रदीफ़: तेरा है या मेरा
क़वाफ़ी: आसमां, जहां, मकां, दां, तर्जुमां, ज़ियाँ

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