दो शा’इर, दो ग़ज़लें (19): क़तील शिफ़ाई और दाग़ देहलवी

क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल: दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं,
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं

आईना-दार-ए-मोहब्बत हूँ कि अरबाब-ए-वफ़ा
अपने ग़म को मिरे अंजाम से पहचानते हैं

बादा ओ जाम भी इक वजह-ए-मुलाक़ात सही
हम तुझे गर्दिश-ए-अय्याम से पहचानते हैं

पौ फटे क्यूँ मिरी पलकों पे सजाते हो इन्हें
ये सितारे तो मुझे शाम से पहचानते हैं

रदीफ़: से पहचानते हैं 
क़ाफ़िए: इलज़ाम, नाम, अंजाम, अय्याम, शाम  

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दाग़ देहलवी की ग़ज़ल: अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का,

अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का,
याद आता है हमें हाए ज़माना दिल का

निगह-ए-यार ने की ख़ाना-ख़राबी ऐसी
न ठिकाना है जिगर का न ठिकाना दिल का

पूरी मेहंदी भी लगानी नहीं आती अब तक
क्यूँकर आया तुझे ग़ैरों से लगाना दिल का

ग़ुंचा-ए-गुल को वो मुट्ठी में लिए आते थे
मैं ने पूछा तो किया मुझ से बहाना दिल का

इन हसीनों का लड़कपन ही रहे या अल्लाह
होश आता है तो आता है सताना दिल का

दे ख़ुदा और जगह सीना ओ पहलू के सिवा
कि बुरे वक़्त में हो जाए ठिकाना दिल का

मेरी आग़ोश से क्या ही वो तड़प कर निकले
उन का जाना था इलाही कि ये जाना दिल का

हूर की शक्ल हो तुम नूर के पुतले हो तुम
और इस पर तुम्हें आता है जलाना दिल का

छोड़ कर उस को तिरी बज़्म से क्यूँकर जाऊँ
इक जनाज़े का उठाना है उठाना दिल का

बे-दिली का जो कहा हाल तो फ़रमाते हैं
कर लिया तू ने कहीं और ठिकाना दिल का

ब’अद मुद्दत के ये ऐ ‘दाग़’ समझ में आया
वही दाना है कहा जिस ने न माना दिल का

रदीफ़: दिल का 
क़ाफ़िए: आना, ज़माना, ठिकाना, लगाना, बहाना, सताना, ठिकाना, जाना, जलाना, उठाना, माना 

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