दो शा’इर दो रूबाई (3): ग़ालिब और फ़िराक़..

मिर्ज़ा ग़ालिब की रूबाई

दुःख जी के पसंद हो गया है ‘ग़ालिब’,
दिल रुककर बन्द हो गया है ‘ग़ालिब’,
वल्लाह कि शब् को नींद आती ही नहीं,
सोना सौगंद हो गया है ‘ग़ालिब’

….
नोट- मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के सबसे महान शा’इरों में शुमार किये जाते हैं. असद उल्लाह ख़ा “ग़ालिब” का जन्म 27 दिसंबर, 1796 को उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में हुआ था. उनका देहांत 15 फ़रवरी 1869 को दिल्ली में हुआ.

फ़िराक़ गोरखपुरी की रूबाई

आ जा कि खड़ी है शाम पर्दा घेरे,
मुद्दत हुई जब हुए थे दर्शन तेरे
मग़रिब से सुनहरी गर्द उठी सू-ए-क़ाफ़,
सूरज ने अग्नि रथ के घोड़े फेरे

(मग़रिब- पश्चिम)
नोट- रघुपति सहाय “फ़िराक़” गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को हुआ था. वो अपने दौर के सबसे कामयाब शा’इरों में से एक थे. उनका देहांत 3 मार्च, 1982 को दिल्ली में हुआ.

रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है.

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