घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी “ढपोरशंख” का तीसरा भाग

ढपोरशंख- मुंशी प्रेमचंद
भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा….लेखक अपने दोस्त के घर आए हुए हैं जो सभी की मदद को तैयार रहता है। ज़रूरत होने पर भी किसी से मदद नहीं लेता, लेखक अपने दोस्त को ढपोरशंख कहकर बुलाते हैं। अब की बार जब लेखक अपने इस दोस्त के यहाँ पहुँचते हैं तो उसके पास ढेरों ख़त रखे देख हैरान होते हैं। ऐसे में दोस्त की पत्नी उन्हें बताती है कि ये पत्र उनके एक नए दोस्त के हैं, जो बेइमान था और उनका पैसा लेकर भाग गया। इस बात पर दोनों की बहस होने लगती है और लेखक को पंच बनाकर ये फ़ैसला करने का अधिकार दिया जाता है। वो अपने मित्र करुणाकर की कहानी बताने लगते हैं। करुणाकर ने ढपोरशंख को ये कहकर पहला पत्र भेजा होता है कि वो एक किताब की समीक्षा लिख दें।इसके बाद से उनका पत्र- व्यवहार बढ़ जाता है। करुणाकर अपनी आपबीती ख़त में लिखने लगता है, जिससे पता चलता है कि वो अपने घर से बाहर काम के सिलसिले में आ गया है। उसे कोई काम नहीं जमता और समय-समय पर उसका काम छूटता जाता है। अकहिर एक रोज़ उसके पत्र में लिखा होता है कि उसे एक जर्मन कम्पनी में काम मिल सकता है अगर वो सौ रुपए ज़मानत के तौर पर दे सके। उसके पास कोई और चारा नहीं है उसे अगर पैसे न मिले तो ये काम हाथ से जाएगा और वो अब आत्महत्या ही कर लेगा। ये बात पढ़कर ढपोरशंख किसी तरह अपनी जमापूँजी उस तक भेजने की सोचता है और पत्नी भी इस मदद के लिए हामी भरती है। अब आगे…)

कल रुपयों का पहुँचना आवश्यक था, नहीं तो अवसर हाथ से निकल जायगा। मनीआर्डर तीन दिन में पहुँचेगा। तुरन्त तारघर गया और तार से रुपये भेज दिये। जिसने बरसों की कतर-ब्योंत के बाद इतने रुपये जोड़े हों और जिसे भविष्य भी अभावमय ही दिखता हो, वही उस आनन्द का अनुभव कर सकता है, जो इस समय मुझे हुआ। सेठ अमीरचन्द को दस लाख का दान करके भी इतना आनन्द न हुआ होगा। दिया तो मैंने ऋण समझकर ही; पर वह दोस्ती का ऋण था, जिसका अदा होना स्वप्न का यथार्थ होना है।

उस पत्र को मैं कभी न भूलूँगा, जो धन्यवाद के रूप में चौथे दिन मुझे मिला। कैसे सच्चे उद्गार थे ! एक-एक शब्द अनुग्रह में डूबा हुआ। मैं उसे साहित्य की एक चीज समझता हूँ।

देवीजी ने चुटकी ली ‘सौ रुपये में उससे बहुत अच्छा पत्र मिल सकता है”

ढपोरशंख ने कुछ जवाब न दिया। कथा कहने में तन्मय थे।

“बम्बई में वह किसी प्रसिद्ध स्थान पर ठहरा था। केवल नाम और पोस्ट-बाक्स लिखने ही से उसे पत्र मिल जाता था। वहाँ से कई पत्र आये। वह प्रसन्न था।

देवीजी बोलीं प्रसन्न क्यों न होता, “कम्पे में एक चिड़िया जो फॅस गई थी”

ढपोरशंख ने चिढ़कर कहा, “या तो मुझे कहने दो, या तुम कहो। बीच में बोलो मत”

बम्बई से कई दिन के बाद एक पत्र आया कि एजेन्सी ने उसके व्यवहार से प्रसन्न होकर उसे काशी में नियुक्त कर दिया है और वह काशी आ रहा है। उसे वेतन के उपरान्त भत्ता भी मिलेगा। काशी में उसके एक मौसा थे, जो वहाँ के प्रसिद्ध डाक्टर थे; पर वह उनके घर न उतरकर अलग ठहरा। इससे उसके आत्मसम्मान का पता चलता है।

मगर एक महीने में काशी से उसका जी भर गया। शिकायत से भरे पत्र आने लगे सुबह से शाम तक फ़ौजी आदमियों की ख़ुशामद करनी पड़ती है। सुबह का गया-गया दस बजे रात को घर आता हूँ, उस वक़्त अकेला अँधेरा घर देखकर चित्त दुख से भर जाता है, किससे बोलूँ, किससे हँसू। बाजार की पूरियाँ खाते-खाते तंग आ गया हूँ। मैंने समझा था, अब कुछ दिन चैन से कटेंगे; लेकिन मालूम होता है अभी क़िस्मत में ठोकरें खाना लिखा है। मैं इस तरह जीवित नहीं रह सकता। रात-रात भर पड़ा रोता रहता हूँ, आदि।

मुझे इन पत्रों में वह अपने आदर्श से गिरता हुआ मालूम हुआ। मैंने उसे समझाया, लगी रोज़ी न छोड़ो, काम किये जाओ। जवाब आया, मुझसे अब यहाँ नहीं रहा जाता ! फ़ौजियों का व्यवहार असह्य है। फिर मैनेजर साहब मुझे रंगून भेज रहे हैं और रंगून जाकर मैं बच नहीं सकता। मैं कोई साहित्यिक काम करना चाहता हूँ। कुछ दिन आपकी सेवा में रहना चाहता हूँ। मैं इस पत्र का जवाब देने जा ही रहा था कि फिर पत्र आया। मैं कल देहरादून-एक्सप्रेस से आ रहा हूँ। दूसरे दिन वह आ पहुँचा। दुबला-सा आदमी, सांवला रंग, लम्बा मुँह, बड़ी-बड़ी आँखें, अँग्रेजी वेश, साथ में कई चमड़े के ट्रंक, एक सूटकेस, एक होल्डाल।

मैं तो उसका ठाट देखकर दंग रह गया। देवीजी ने टिप्पणी की- “फ़िर भी तो न चेते”

मैंने समझा था, गाढ़े का कुर्त्ता, चप्पल, ज्यादा-से-ज्यादा फाउण्टेन पेन वाला आदमी होगा, मगर यहमहाशय तो पूरे साहब बहादूर निकले। मुझे इस छोटे-से घर में उन्हें ठहराते हुए संकोच हुआ।

देवीजी से बिना बोले न रहा गया, “आते ही श्री-चरणों पर सिर तो रख दिया, अब और क्या चाहते थे”

ढपोरशंख अबकी मुसकाये- “देखो श्यामा, बीच-बीच में टोको मत। अदालत की प्रतिष्ठा यह कहती है कि अभी चुपचाप सुनती जाओ। जब तुम्हारी बारी आये, तो जो चाहे कहना”

फिर सिलसिला शुरू हुआ था — था तो दुबला-पतला मगर बड़ा फुर्तीला, बातचीत में बड़ा चतुर, एक जुमला अँग्रेज़ी बोलता, एक जुमला हिन्दी, और हिन्दी-अँग्रेज़ी की खिचड़ी, जैसे आप जैसे सभ्य लोग बोलते हैं।

बातचीत शुरू हुई– “आपके दर्शनों की बड़ी इच्छा थी। मैंने जैसा अनुमान किया था, वैसा ही आपको देखा। बस, अब मालूम हो रहा है, कि मैं भी आदमी हूँ। इतने दिनों तक क़ैदी था”

मैंने कहा, “तो क्या इस्तीफा दे दिया?”

“नहीं, अभी तो छुट्टी लेकर आया हूँ। अभी इस महीने का वेतन भी नहीं मिला। मैंने लिख दिया है, यहाँ के पते से भेज दें। नौकरी तो अच्छी है; मगर काम बहुत करना पड़ता है और मुझे कुछ लिखने का अवसर नहीं मिलता”

ख़ैर, रात को मैंने इसी कमरे में उन्हें सुलाया। दूसरे दिन यहाँ के एक होटल में प्रबन्ध कर दिया। होटलवाले पेशगी रुपये ले लेते हैं। जोशी के पास रुपये न थे। मुझे तीस रुपये देने पड़े। मैंने समझा, इसका वेतन तो आता ही होगा, ले लूँगा।

यहाँ मेरे एक माथुर मित्र हैं। उनसे भी मैंने जोशी का जिक्र किया था। उसके आने की ख़बर पाते ही होटल दौड़े। दोनों में दोस्ती हो गई। जोशी दो-तीन बार दिन में, एक बार रात को ज़रूर आते और ख़ूब बातें करते। देवीजी उनको हाथों पर लिए रहतीं। कभी उनके लिए पकौड़ियाँ बन रही हैं, कभी हलवा। जोशी हरफ़नमौला था। गाने में कुशल, हारमोनियम में निपुण, इन्द्रजाल के करतब दिखलाने में कुशल। सालन अच्छा पकाता था। देवीजी को गाना सीखने का शौक पैदा हो गया। उसे म्यूजिक मास्टर बना लिया।

देवीजी लाल मुँह करके बोलीं – “तो क्या मुफ्त में हलवा, पकौड़ियाँ और पान बना-बनाकर खिलाती थी?”

एक महीना गुजर गया पर जोशी का वेतन न आया। मैंने पूछा, भी नहीं। सोचा, अपने दिल में समझेगा, अपने होटलवाले रुपयों का तकाजा कर रहे हैं। माथुर के घर भी उसने आना-जाना शुरू कर दिया। दोनों साथ घूमने जाते, साथ रहते। जोशी जब आते, माथुर का बखान करते, माथुर जब आते जोशी की तारीफ़ करते। जोशी के पास अपने अनुभवों का विशेष भंडार था। वह फ़ौज में रह चुका था। जब उसकी मंगेतर का विवाह दूसरे आदमी से हो गया, तो शोक में उसने फ़ौजी नौकरी छोड़ दी थी। सामाजिक जीवन की न जाने कितनी ही घटनाएँ उसे याद थीं। और जब अपने माँ-बाप और चाचा-चाची का जिक्र करने लगता, तो उसकी आँखों में आँसू भर आते। देवीजी भी उसके साथ रोतीं।

देवीजी तिरछी आँखों से देखकर रह गईं। बात सच्ची थी।

क्रमशः

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