साहित्य दुनिया सीरीज़ (7): 10 शा’इर, 10 शे’र..

1.
उस बिन जहान कुछ नज़र आता है और ही,
गोया वो आसमाँ नहीं, वह ज़मीं नहीं

जुर’अत

2.
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

मिर्ज़ा ग़ालिब

3.
दर्दे दिल, पासे वफ़ा, जज़्बए ईमाँ होना,
आदमीयत है यही और यही इंसाँ होना

बृज नारायण ‘चकबस्त’

4.
इस छेड़ में कोई जो ना मरता है तो मर जाए,
वादा है कहीं और, इरादा है कहीं और

नज़्म तबातबाई

5.
दिन हो कि रात एक मुलाक़ात की है बात,
इतनी सी बात भी ना बन आए तो क्या करूँ

हफ़ीज़ जालंधरी

6.
कोई आया तिरी झलक देखी
कोई बोला सुनी तिरी आवाज़

जोश मलीहाबादी

7.
‘अख़्तर’ गुज़रते लम्हों की आहट पे यूँ न चौंक
इस मातमी जुलूस में इक ज़िंदगी भी है

अख़्तर होशियारपुरी

8.
इक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम
नाज़िल हों दिल पे रोज़ बलाएँ तो क्या करें

अख़्तर शीरानी

9.
आज जलसे हैं बहुत शहर में लीडर कम हैं,
एहतियातन मुझे तक़रीर रटा दी जाए

दिलावर फ़िगार

10.
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

फ़ैज़ अहमद “फ़ैज़”

[फ़ोटो क्रेडिट (फ़ीचर्ड इमेज): नेहा शर्मा]

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