असरार उल हक़ मजाज़

दो शाइर दो ग़ज़लें शाइरी साहित्य दुनिया

दो शा’इर, दो ग़ज़लें (20): दुष्यंत कुमार और मजाज़

दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल: ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो दर्द-ए-दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा इस कबूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे आज सय्याद को महफ़िल […]

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मजाज़ की ग़ज़ल: बर्बाद-ए-तमन्ना पे इताब और ज़ियादा

बर्बाद-ए-तमन्ना पे इताब और ज़ियादा, हाँ मेरी मुहब्बत का जवाब और ज़ियादा रोएँ न अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे होना है अभी मुझ को ख़राब और ज़ियादा आवारा ओ मजनूँ ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ मिलने हैं अभी मुझ को ख़िताब और ज़ियादा उट्ठेंगे अभी और भी तूफ़ाँ मिरे दिल से देखूँगा अभी इश्क़ के […]

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मजाज़ की ग़ज़ल: बस इस तक़्सीर पर अपने मुक़द्दर में है मर जाना,

बस इस तक़्सीर पर अपने मुक़द्दर में है मर जाना, तबस्सुम को तबस्सुम क्यूँ नज़र को क्यूँ नज़र जाना ख़िरद वालों से हुस्न ओ इश्क़ की तन्क़ीद क्या होगी न अफ़्सून-ए-निगह समझा न अंदाज़-ए-नज़र जाना मय-ए-गुलफ़ाम भी है साज़-ए-इशरत भी है साक़ी भी बहुत मुश्किल है आशोब-ए-हक़ीक़त से गुज़र जाना ग़म-ए-दौराँ में गुज़री जिस क़दर […]

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मजाज़ की ग़ज़ल: दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी

दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी, इश्क़ ना-पुख़्ता अभी जज़्ब-ए-दरूँ ख़ाम अभी ख़ुद ही झुकता हूँ कि दावा-ए-जुनूँ क्या कीजिए कुछ गवारा भी है ये क़ैद-ए-दर-ओ-बाम अभी ये जवानी तो अभी माइल-ए-पैकार नहीं ये जवानी तो है रुस्वा-ए-मय-ओ-जाम अभी वाइज़ ओ शैख़ ने सर जोड़ के बदनाम किया वर्ना बदनाम न होती मय-ए-गुलफ़ाम अभी मैं ब-सद-ब-सद-फ़ख़्रिया […]

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मजाज़ की ग़ज़लें: धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं,

धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं, ये किस की आहें ये किस के नाले तमाम आलम पे छा रहे हैं नक़ाब रुख़ से उठा चुके हैं खड़े हुए मुस्कुरा रहे हैं मैं हैरती-ए-अज़ल हूँ अब भी वो ख़ाक हैराँ बना रहे हैं हवाएँ बे-ख़ुद फ़ज़ाएँ बे-ख़ुद ये […]

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मजाज़ की ग़ज़ल: हुस्न को बे-हिजाब होना था

हुस्न को बे-हिजाब होना था , शौक़ को कामयाब होना था हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछ ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था तेरे जल्वों में घिर गया आख़िर ज़र्रे को आफ़्ताब होना था कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी कुछ मुझे भी ख़राब होना था रात तारों का टूटना भी ‘मजाज़’ बाइस-ए-इज़्तिराब होना था असरार उल हक़ […]

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मजाज़ की ग़ज़ल: हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए

हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए, दिल की जानिब नज़र है क्या कहिए फिर वही रहगुज़र है क्या कहिए ज़िंदगी राह पर है क्या कहिए हुस्न ख़ुद पर्दा-वर है क्या कहिए ये हमारी नज़र है क्या कहिए आह तो बे-असर थी बरसों से नग़्मा भी बे-असर है क्या कहिए हुस्न है अब न हुस्न के […]

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इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम

इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम, हट कर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम क्या पूछते हो झूमते आए कहाँ से हम पी कर उठे हैं ख़ुम-कदा-ए-आसमाँ से हम क्यूँकर हुआ है फ़ाश ज़माने पे क्या कहें वो राज़-ए-दिल जो कह न सके राज़-दाँ से हम हमदम यही है रहगुज़र-ए-यार-ए-ख़ुश-ख़िराम गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशाँ […]

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मजाज़ की ग़ज़ल- अक़्ल की सतह से कुछ और उभर जाना था

अक़्ल की सतह से कुछ और उभर जाना था, इश्क़ को मंज़िल-ए-पस्ती से गुज़र जाना था जल्वे थे हल्क़ा-ए-सर दाम-ए-नज़र से बाहर मैंने हर जल्वे को पाबंद-ए-नज़र जाना था हुस्न का ग़म भी हसीं फ़िक्र हसीं दर्द हसीं उन को हर रंग में हर तौर सँवर जाना था हुस्न ने शौक़ के हंगामे तो देखे […]

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मजाज़ की ग़ज़ल: दर्द की दौलत-ए-बेदार अता हो साक़ी

दर्द की दौलत-ए-बेदार अता हो साक़ी हम बही-ख़्वाह सभी के हैं भला हो साक़ी सख़्त-जाँ ही नहीं हम ख़ुद-सर-ओ-ख़ुद्दार भी हैं नावक-ए-नाज़ ख़ता है तो ख़ता हो साक़ी सई-ए-तदबीर में मुज़्मर है इक आह-ए-जाँ-सोज़ उस का इनआ’म सज़ा हो कि जज़ा हो साक़ी सीना-ए-शौक़ में वो ज़ख़्म कि लौ दे उठ्ठे और भी तेज़ ज़माने […]

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