मुश्किलों से डरने की बजाय उनका डटकर सामना करने का संदेश देती है किताब “So What”

सोनल सोनकवड़े का उपन्यास “कॉमा” पढ़ने के बाद जहाँ कई सवालों के जवाब मिले और रोमांच से भरा एक बेहतरी कहानी का सफ़र तय हुआ, वहीं कई ऐसे सवाल भी थे जो परी के पहले रिश्ते से जुड़े थे। अक्सर ऐसे कई सवाल आसपास मिलने वाले लोगों की ज़िंदगी से जुड़े होते हैं जो हमें पता ही नहीं चल पाते। “कॉमा” पढ़ते समय परी से इस तरह का लगाव हुआ कि उसके बीते जीवन के बारे में जानने की इच्छा भी थी। पाठकों की भावना लेखिका सोनली सोनकवड़े ने समझ ली थी। तभी तो “कॉमा” का प्रीक़्वल “सो व्हाट” लिखकर वो ले आयीं।

सोनल सोनकवड़े का ये दूसरा उपन्यास है लेकिन जिस तरह से वो पहले उपन्यास में बाँधकर रखने में सफल हुई थीं वैसे ही इस उपन्यास का असर भी हुआ। कॉमा में जिस मज़बूत ऑफ़िसर परी को हमने पाया था वो किस तरह से इतनी मज़बूत हुई ये कहानी इस उपन्यास के ज़रिए पाठकों तक पहुँची। वैसे तो दोनों ही उपन्यास पढ़ने लायक हैं और दोनों की कहानी एक ही किरदार की कहानी होते हुए भी, दोनों उपन्यास एक- दूसरे से अपना अलग महत्व रखते हैं। हम तो कहेंगे कि दोनों उपन्यास को पढ़ना ही चाहिए।

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परी लोगों के लिए जो कल्पना होती है ऐसी ज़िंदगी जी रही है लेकिन ज़िंदगी में कैसा भी वक़्त हो बीत ही जाता है। परी के सामने भी कई चुनौतियाँ आती हैं। ऐसे में उसके पास दो रास्ते हैं या तो वो हार मानकर परिस्थितियों के सामने घुटने टेक दे या सीधे खड़े होकर उनका सामना करे। परी सामना करने का रास्ता चुनती है, इस रास्ते में उसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है लेकिन वो हार नहीं मानती।

चुपचाप सहने वाले लोगों के लिए ये उपन्यास एक प्रेरणा बन सकती है। जहाँ ज़रूरत लगे वहाँ लड़ना ज़रूरी है। ऐसी बातों को अच्छी तरह लोगों के सामने रखने के लिए लेखिका सोनल सोनकवड़े बधाई की पात्र हैं और उनकी लेखनशैली का प्रवाह एक बार पढ़ना शुरू करते ही ऐसे बाँध लेता है कि पूरा पढ़कर भी कुछ बाक़ी सा लगता है। ये एक अच्छे लेखन की ख़ूबी है। लेखिका के दो उपन्यास पढ़ने के बाद हम उम्मीद करते हैं कि वो जल्द ही तीसरा उपन्यास भी लाएँगी।

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