शाइरी की बातें (3): नज़्म क्या है?

नज़्म अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है जिसका अर्थ होता है ‘पिरोना’,’लड़ी’ या ‘कलाम ए शा’इर’. गुज़िश्ता ज़माने में तो शा’इरी को ही नज़्म कहा जाता था. इसका अर्थ ये हुआ कि किसी भी क़िस्म की शा’इरी नज़्म है लेकिन वक़्त के आगे बढ़ने के साथ नज़्म अपने आप में एक क़िस्म के रूप में विकसित हुई. आज उर्दू शा’इरी की दो जो बड़ी क़िस्में हैं उनमें से एक ग़ज़ल है और दूसरी नज़्म.

नज़्म की सबसे पहली शर्त है कि पूरी नज़्म एक विषय पर आधारित होती है और अपने विषय से किसी भी तरह से भटक नहीं सकती. ऐसा भी कहा जा सकता है कि नज़्म अपने आप में एक कहानी है जो शा’इरी की तरह से कही जा रही है. नज़्म अपनी ही तरह से शुरू होती है और धीरे-धीरे ये खुलती है, आख़िर तक आते-आते ये निष्कर्ष पर पहुँचती है. नज़्म और ग़ज़ल में यही बुनियादी फ़र्क़ है कि एक ग़ज़ल का हर शेर उसी ग़ज़ल के दूसरे शेरों के अर्थ से अलग होता है जबकि नज़्म मुकम्मल तौर पर एक ही विषय की बात करती है. हालाँकि हर शेर अपने आप में एक मुकम्मल नज़्म है तो ऐसा भी कह सकते हैं कि एक ग़ज़ल में जितने शेर होते हैं उतनी ही नज़्में होती हैं.

देखा जाए तो नज़्म तीन प्रकार की होती है. पाबन्द नज़्म, आज़ाद नज़्म और नस्री नज़्म. आइये जानते हैं इनके बारे में-

पाबन्द नज़्म: पाबन्द नज़्म में बह्र, वज़्न और क़ाफ़िए की पाबंदी ज़रूरी है. हालाँकि रदीफ़ के होने या न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. नज़्म के अश’आर ग़ज़ल की सूरत में भी हो सकते हैं और उससे अलग भी. एक नज़्म में मिसरों की संख्या की कोई पाबन्दी नहीं है लेकिन अगर नज़्म पाबन्द है तो हर मिसरे में बह्र, वज़्न और क़ाफ़िए की पाबंदी ज़रूर होगी. पाबन्द नज़्म की एक मिसाल(का एक उदाहरण) हम नीचे दे रहे हैं-

अल्लामा ‘इक़बाल’ की नज़्म जिसका उनवान (शीर्षक) है ‘फ़रमान-ए-ख़ुदा’, पाबन्द नज़्म का अच्छा उदाहरण है.देखिए-

“उठ्ठो मिरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो
काख़-ए-उमरा के दर ओ दीवार हिला दो
गर्माओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से
कुन्जिश्क-ए-फ़रोमाया को शाहीं से लड़ा दो
सुल्तानी-ए-जम्हूर का आता है ज़माना
जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आए मिटा दो
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
क्यूँ ख़ालिक़ ओ मख़्लूक़ में हाइल रहें पर्दे
पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दो
हक़ रा ब-सजूदे सनमाँ रा ब-तवाफ़े
बेहतर है चराग़-ए-हरम-ओ-दैर बुझा दो
मैं ना-ख़ुश ओ बे-ज़ार हूँ मरमर की सिलों से
मेरे लिए मिट्टी का हरम और बना दो
तहज़ीब-ए-नवी कारगह-ए-शीशागराँ है
आदाब-ए-जुनूँ शाइर-ए-मशरिक़ को सिखा दो

पाबन्द नज़्मों में बंद तीन मिसरों का हो तो मुसल्लस कहलाता है वहीं 4 मिसरों का बंद हो तो मुरब्बा. 5, 6 और 7 मिसरों के बंद को क्रमशः मुख़म्मस, मुसद्दस और मुसम्मन कहते हैं.

आज़ाद नज़्म: आज़ाद नज़्म के बारे में एक बहुत ज़रूरी बात समझने की है वो ये कि ये बिलकुल भी बह्र की पाबंदी से आज़ाद नहीं होती.आज़ाद नज़्म में मिसरे बह्र-ओ-वज़्न में होते हैं लेकिन इसमें रदीफ़ और क़ाफ़िए की पाबंदी नहीं होती है. आज़ाद नज़्म में मिसरे वज़्न में होना ज़रूरी हैं, हालाँकि इसमें बह्र के अरकान की तादाद मुक़र्रर नहीं होती. कहने का अर्थ है कि किसी मिसरे के अरकान पूरे हो सकते हैं तो किसी में ज़्यादा, किसी में कम भी. इस सिलसिले में जब आगे बातें होंगी तो और क्लैरिटी आएगी, अभी मिसाल के तौर पर ये नज़्म देखें-

‘फ़ैज़’ की नज़्म जिसका उनवान है ‘तन्हाई’-

“फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं
राह-रौ होगा कहीं और चला जाएगा
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ार
अजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आएगा”

* इस नज़्म में सभी मिसरे एक वज़्न में नहीं हैं लेकिन लयबद्धता है.
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अख़्तर-उल-ईमान की नज़्म ‘फ़ासला’ भी आज़ाद नज़्म का अच्छा उदाहरण है.

फ़ासला

“हवाएँ ले गईं वो ख़ाक भी उड़ा के जिसे
कभी तुम्हारे क़दम छू गए थे और मैंने
ये जी से चाहा था दामन में बाँध लूँगा उसे
सुना था मैं ने कभी यूँ हुआ है दुनिया में
कि आग लेने गए और पयम्बरी पाई
कभी ज़मीं ने समुंदर उगल दिए लेकिन
भँवर ही ले गए कश्ती बचा के तूफ़ां से
में सोचता हूँ पयम्बर नहीं अगर न सही
कि इतना बोझ उठाने की मुझ में ताब न थी
मगर ये क्यूँ न हुआ ग़म मिला था दूरी का
तो हौसला भी मिला होता संग ओ आहन सा
मगर ख़ुदा को ये सब सोचने का वक़्त कहाँ?

नस्री नज़्म: नस्र अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है जिसका अर्थ होता है ‘बिखरा हुआ’ या परेशान. नस्री नज़्म में रदीफ़, क़ाफ़िए, बह्र या वज़्न की पाबंदी नहीं होती है. सही मायनों में देखा जाए तो ये शा’इरी के हर बुनियादी उसूल से लगभग आज़ाद होती है लेकिन इसमें भी एक पाबंदी है और वो है विषय की. नस्री नज़्म में यही एक पाबंदी है. अक्सर नस्री नज़्म कहने वाले अपने विषय को किसी पाबंदी में बाँधना नहीं चाहते, इसलिए वो इस तरीक़े से अपनी बात कहते हैं. आज के दौर में नस्री नज़्म का काफ़ी चलन है.

परवीन शाकिर की नज़्म ‘बुलावा’ नस्री नज़्म का उदाहरण है.

मैंने सारी उम्र
किसी मंदिर में क़दम नहीं रक्खा
लेकिन जब से
तेरी दुआ में
मेरा नाम शरीक हुआ है
तेरे होंटों की जुम्बिश पर
मेरे अंदर की दासी के उजले तन में
घंटियाँ बजती रहती हैं!

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आज इतना ही, हम कल फिर हाज़िर होंगे. कल की हमारी पोस्ट ‘वज़्न’ क्या है?’, इस बारे में होगी. अगर आप नज़्म पढ़ने के शौक़ीन हैं तो हर मंगलवार साहित्य दुनिया की सीरीज़ ‘दो शाइर दो नज़्में’ ज़रूर पढ़ें. इस हफ़्ते की नज़्में पढ़ने के लिए यहाँ ‘क्लिक करें’

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