शाइरी की बातें (2): ग़ज़ल क्या है?

हमने इसके पहले आपको ‘शाइरी क्या है?’ इस बारे में बताया था. आज से हम शाइरी की अलग-अलग क़िस्मों के बारे में बात करेंगे. सबसे पहले बात करते हैं ग़ज़ल की.

ग़ज़ल: एक ही ज़मीन में कहे गए अश’आर(शेर का बहुवचन) के समूह को ग़ज़ल कहते हैं. जैसा कि इसके पहले की पोस्ट में हमने आपको बताया था कि ग़ज़ल में एक ही ज़मीन होती है और पूरी ग़ज़ल एक बह्र में ही कही जाती है. ज़मीन और बह्र क्या हैं, इसे समझने से पहले हम कुछ और ज़रूरी बातें यहाँ करना चाहेंगे. हालाँकि सभी शेर एक ही ज़मीन में कहे जाते हैं लेकिन हर एक शे’र का अपना अर्थ होता है, अर्थ के मामले में दो शे’र एक दूसरे से जुड़े नहीं होते. ग़ालिब की एक ग़ज़ल के दो शे’र देखिए-

“दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को इक अदा में रज़ा-मंद कर गई

मारा ज़माने ने असदुल्लाह ख़ाँ तुम्हें,
वो वलवले कहाँ वो जवानी किधर गई”

ये दोनों अश’आर अलग-अलग अर्थ वाले हैं, पहला शे’र दूसरे शे’र से अर्थ के ऐतबार से देखें तो बिलकुल जुदा है लेकिन रदीफ़, क़ाफ़िया, ज़मीन, बह्र एक ही है.आइये जानते हैं इसी से जुड़ी कुछ और बातों के बारे में-

शे’र: दो मिसरों की ऐसी कविता जिसके दोनों मिसरे एक बह्र और एक ही ज़मीन पर हों, शे’र कहलाती है. शे’र अगर मत’ला है तो दोनों मिसरों में रदीफ़ और क़ाफ़िए की पाबंदी होगी अन्यथा सिर्फ़ मिसरा-ए-सानी (दूसरे मिसरे) में रदीफ़, क़ाफ़िए की पाबंदी होगी.

मिसरा: किसी भी पंक्ति (लाइन) को मिसरा कहते हैं.
मिसरा-ए-ऊला: शे’र के पहले मिसरे को मिसरा ए ऊला (ऊला मिसरा) कहते हैं.
मिसरा-ए-सानी: शे’र के दूसरे या’नी अंतिम मिसरे को मिसरा-ए-सानी कहते हैं.

रदीफ़: ग़ज़ल या क़सीदे के शेरों के अंत में जो शब्द या शब्द-समूह बार-बार दुहराए जाते हैं, उन्हें रदीफ़ कहते हैं. मत’ले में रदीफ़ दोनों मिसरों में रहती है जबकि ग़ज़ल के बाक़ी शे’रों में सिर्फ़ मिसरा-ए-सानी(दूसरे मिसरे) में ही इसका इस्तेमाल होता है.
क़ाफ़िया: रदीफ़ से ठीक पहले आने वाले वो शब्द जो एक ही आवाज़ पर ख़त्म होते हैं, उन्हें क़ाफ़िया कहते हैं.मत’ला में क़ाफ़िया दोनों मिसरों में इस्तेमाल होता है जबकि बाक़ी शे’रों में ये सिर्फ़ मिसरा-ए-सानी में आता है.

ज़मीन: हर ग़ज़ल की एक ज़मीन होती है. जिन ग़ज़लों के छंद, रदीफ़ और क़ाफ़िये एक ही होते हैं, उन्हें एक ही ज़मीन की ग़ज़लें कहते हैं. तरही मुशा’इरों में पढ़ी जाने वाली सारी ग़ज़लें एक ही ज़मीन की होती हैं.

तरह/मिसरा ए तरह: तरही मुशाइरों का ये क़ायदा है कि संयोजक गण मुशाइरे की घोषणा के साथ ही एक मिसरा भी दे देते हैं और उसकी रदीफ़ और क़ाफ़िये का उल्लेख भी कर देते हैं. जो मिसरा संयोजक देते हैं, उसी ज़मीन पर सबको ग़ज़ल कहनी होती है.

मत’ला: ग़ज़ल या क़सीदे का वो शे’र जिसके दोनों मिसरों में रदीफ़ और क़ाफ़िये का इस्तेमाल होता है उसे मत’ला कहते हैं. अक्सर को ग़ज़ल का पहला शे’र मत’ला होता है लेकिन एक ग़ज़ल में एक से अधिक मत’ले भी हो सकते हैं, इसको लेकर कोई पाबंदी नहीं है. एक बात और बता देना ज़रूरी है कि किसी ग़ज़ल में मत’ला ना होना कोई दोष नहीं है. हालाँकि क़सीदों के लिहाज़ से कहा जाता है कि बग़ैर मत’ला क़सीदे वो मज़ा नहीं देते.

मक़ता: ग़ज़ल का आख़िरी शे’र मक़ता कहलाता है.अक्सर इसमें शा’इर अपने तख़ल्लुस (pen name) का इस्तेमाल करता है.
तख़ल्लुस: शा’इर जिस नाम से शा’इरी करता है उसे तख़ल्लुस कहते हैं जैसे रघुपति सहाय गोरखपुरी का तख़ल्लुस ‘फ़िराक़’ है जिन्हें हम ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी के नाम से जानते हैं.

अब इन्हीं बातों को अहमद ‘फ़राज़’ की एक ग़ज़ल के ज़रिए समझते हैं.

क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता,
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता

आँखें हैं कि ख़ाली नहीं रहती हैं लहू से,
और ज़ख़्म-ए-जुदाई है कि भर भी नहीं जाता

वो राहत-ए-जाँ है मगर इस दर-बदरी में,
ऐसा है कि अब ध्यान उधर भी नहीं जाता

दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है,
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता

पागल हुए जाते हो ‘फ़राज़’ उससे मिले क्या,
इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता

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# फ़राज़ की इस ग़ज़ल में रदीफ़ ‘भी नहीं जाता’ है.
# क़ाफ़िए ‘उतर, कर, भर, उधर, डर और मर’ हैं (ग़ौर करें कि सभी एक ही प्रकार की आवाज़ पर ख़त्म हो रहे हैं).
# पहले शे’र के दोनों मिसरों में रदीफ़, क़ाफ़िए की पाबंदी है… ये मत’ला है.
# हम देख सकते हैं कि मक़ता (आख़िरी शे’र) में शा’इर ने तख़ल्लुस का इस्तेमाल किया है.
# अगर आप ध्यान दें तो फ़राज़ की इस ग़ज़ल के हर शेर में एक ही प्रकार की लयबद्धता है, एक ही बह्र, रदीफ़ और क़वाफ़ी (क़ाफ़िया का बहुवचन) देखे जा सकते है.. इसी को ग़ज़ल की ज़मीन कहते हैं.
# ग़ज़ल का हर एक शे’र अपने आप में मुकम्मल अर्थ बताता है.

** ग़ज़ल में शेरों की संख्या निर्धारित नहीं है, फिर भी ये माना जाता है कि इसमें कम से कम पांच शे’र तो होने ही चाहिएँ और अधिक से अधिक शे’रों की कोई सीमा नहीं है. गुज़िश्ता ज़माने में लोग ये मानते थे कि ग़ज़ल में अश’आर (शे’रों) की संख्या विषम होनी चाहिए लेकिन इस नियम का न तब कोई पालन करता था और न ही आज इस पर कोई ध्यान देता है, यूँ भी इस नियम का कोई मतलब भी नहीं है.

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