राईशा लालवानी की किताब “The diary on the Fifth Floor” की समीक्षा

साहित्य दुनिया

इन दिनों हम कितनी बेवजह की उलझनों में उलझे रहते हैं..।इन मानसिक उलझनों का हल हमारे पास ही है बस वो कहीं नज़र नहीं आता और हम इन उलझनों को सुलझाने की बजाय और ज़्यादा उलझते जाते हैं। कुछ समझ नहीं आता और पता भी नहीं चलता कि कब हमारी स्वाभाविक हँसी खो गयी? कब हम अकेले होते चले गए और कब हम ख़ुद को डिप्रेशन में धकेल चुके हैं?
इन सारे सवालों, बातों और मानसिक उलझनों को सुलझाने के एक नए नज़रिए से मिलना हो तो आप पढ़ सकते हैं “राईशा लालवानी” की लिखी किताब “The Diary on the Fifth Floor”

यूँ तो ये किताब अंग्रेज़ी में लिखी गयी है लेकिन इसकी भाषा इतनी सरल और सहज है कि समझना बहुत ही आसान है। ये कहानी है एक लड़की की जो कई तरह के मानसिक उथलपुथल से गुज़र रही है और एक मनोचिकित्सक को अपनी डायरी देते ही उसे ये डर सताता है कि अब एक अनजान इंसान के सामने उसके सारे राज़ बाहर आ जाएँगे। आख़िर इस डायरी में ऐसा क्या लिखा है और किस तरह ये लड़की अपनी मंज़िल तय कर पाती है? क्या उसे अपने सवालों के जवाब मिलते हैं?

इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए आप इस किताब के पन्नों का सफ़र तय करते हैं। कहानी न बताने का कारण ये है कि आप इस किताब को पढ़ते हुए ख़ुद इन सवालों से रूबरू हों और उनके जवाब पता करें।
अगर बात करें “राईशा लालवानी” के लेखन की। ये उनकी पहली किताब है और इसे पढ़कर एक बात का पूरा अंदाज़ा होता है कि उन्होंने लिखने से पहले ढेर सारी पढ़ाई की है। ये बात उनकी लेखनशैली में झलकती है। किताब की शुरुआत में ही राईशा ये सवाल रखती हैं:
“ The main Question here is: Do we like who we have become?”

ये शायद एक ऐसा सवाल है जो कभी न कभी हर व्यक्ति के दिमाग़ में कौंधता है। इसी तरह वो मानसिक उथलपुथल और मनोभावों को व्यक्त करने में भी सफल रहती हैं इस लाइन पर नज़र डालें किस बेहतरीन ढंग से मनोचिकित्सक के पास जाते समय एक व्यक्ति की नर्वसनेस और मनोस्थिति को बयान किया है:
“I realized it was the time to let go of the half-damp tissue I had been crushing and squeezing ever since I had entered the hospital.”

पूरी किताब में इस तरह की डिटेलिंग नज़र आती है। किसी रूम, किसी व्यक्ति, किसी जगह के बारे में लिखते हुए राईशा अपने लेखन से पूरा चित्र ही उतार देती हैं। उनके पास सामाजिक बदलाव को देखने की एक नज़र है ये बात भी कहानियों में झलकती है। एक फ़िक्शन उपन्यास होते हुए भी इसमें कल्पना से ज़्यादा वास्तविकता नज़र आती है। इन कहानियों को पढ़ते हुए आप अपने आसपास की कई घटनाओं को याद कर पाएँगें और ये कहानी कम बल्कि आपके आसपास की कोई घटना ज़्यादा लगेगी।
ये अपनी तरह की एक ऐसा उपन्यास है जिसमें डायरी एंट्री के तौर पर कई शॉर्ट स्टोरीज़ हैं लेकिन ख़ास बात ये है कि इन सारी कहानियों के साथ एक मूल कहानी भी चलती है और इसकी वजह से पाठक का लिंक कहानी के साथ बना रहता है।किताब की भाषा सरल होने के साथ-साथ प्रवाहपूर्ण है, एक बार पढ़ना शुरू करते ही पता नहीं चलता कि आप कब पूरी किताब पढ़ जाते हैं।

एक बात जो इस किताब में अच्छी है वो ये कि इस उपन्यास की कहानी में आपको समाज में फैली उलझनें, परेशनियाँ भी नज़र आती हैं वहीं उन्हें देखने और उन्हें दूर करने का एक अलग नज़रिया भी मुहैया करवाया जाता है। तो न सिर्फ़ एक मुद्दा उठाया गया है बल्कि उसका समाधान भी सुझाया गया है। पहली कोशिश के रूप में देखा जाए तो ये उपन्यास बिलकुल पढ़ने लायक है।

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