साहिर लुधियानवी: संगीतकार से भी ज़्यादा शोहरत कमाने वाला गीतकार

साहिर लुधियानवी, एक ऐसा नाम जिसे किसी पहचान की ज़रुरत ना कल थी और ना आज है. साहिर 20वीं सदी के सबसे मशहूर गीतकार और उम्दा शा’इर थे. उनका जन्म लुधियाना के एक जागीरदार घराने में 8 मार्च, 1921 को हुआ. साहिर की पढ़ाई-लिखाई भी यहीं हुई और कहा जाता है कि सन 1939 में जब वो गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे, उन्हें अमृता प्रीतम से इश्क़ हो गया. इश्क़ को दुनिया के तराज़ू में तोलने वाले लोग कहते हैं कि ये इश्क़ नाकामयाब रहा लेकिन अगर इश्क़ कोई शय है तो वो कामयाब या नाकामयाब कैसे हो सकती है. कहा जाता है कि अमृता साहिर की शा’इरी की दीवानी थीं. दुनिया,समाज और धर्म के हिसाब किताब में फँस कर अमृता-साहिर का इश्क़ दो टुकड़ों में बंट गया, एक टुकड़ा जो सदा साहिर के पास रहा और एक टुकड़ा अमृता के पास..

साहिर का असली नाम अब्दुल हई साहिर था. उनकी किताब तल्ख़ियाँ सन 1943 में मंज़र-ए-आम पर आयी और आते ही मशहूर हो गयी. 1945 में साहिर अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार के सम्पादक बने. सन 1949 में उन्होंने पहली बार किसी फ़िल्म के लिए गाने लिखे. फ़िल्म का नाम था आज़ादी की राह पर.साहिर को प्रसिद्धि मिलने में भी अधिक समय ना लगा और जल्दी ही वो बॉलीवुड के टॉप के गीतकार हो गए. उनकी पॉपुलैरिटी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 1957 में गुरु दत्त की मशहूर फ़िल्म प्यासा के गाने रिलीज़ हुए तो इसके संगीत के लिए जितनी सराहना एसडी बर्मन को मिली उससे कहीं अधिक साहिर को मिली. कहा तो ये भी जाता है कि दादा बर्मन साहिर की कामयाबी से इस क़दर परेशान हुए कि उन्होंने दुबारा साहिर के साथ काम ना करने का फ़ैसला कर लिया और दोनों महान कलाकारों ने फिर कभी साथ काम नहीं किया.

उन्होंने उस दौर के सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम किया था. साहिर के बारे में ये भी कहा जाता है कि वो एकमात्र ऐसे गीतकार रहे हैं जिनको संगीतकार से भी अधिक पैसे दिए जाने लगे थे. ये संगीतकारों को कभी पसंद ना आया. साहिर की पॉपुलैरिटी का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वो संगीत के हिसाब से गाने नहीं लिखते थे बल्कि पहले वो गीत लिख देते थे फिर उस हिसाब से संगीतकार को धुन बनानी होती थी. अगर ये कहा जाए कि साहिर ने ही गीतकारों को बॉलीवुड में वो जगह दिलायी जिसके गीतकार हक़दार होते हैं तो ग़लत ना होगा.

साहिर की ज़िन्दगी में एक वक़्त में सुधा मल्होत्रा भी रहीं. गायिका सुधा मल्होत्रा से उनके संबंधों के बारे में कहा जाता है कि कई बार साहिर के कहने पर भी उन्हें गाने दिए गए थे. हालाँकि इस बात की कभी पुष्टि नहीं हुई है. साहिर का 59 वर्ष की आयु में 25 अक्टूबर, 1980 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.

“माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके
कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम”

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