रसगुल्ला की जासूसी

नदी के कनारे ननकू और नैंसी खो गए थे, जब डॉली मौसी ने ये बात बतायी तो सभी ननकू और नैंसी की तलाश में निकल गए थे। नदी के किनारे पर सब उन्हें आवाज़ देते जा रहे थे

“नैंसी…ननकू..ननकू..नैंसी”

“पता नहीं माँ…इतना छोटा-सा तो है कहाँ चला गया..”- माँ बहुत परेशान होकर नानी से बोली

“मिल जाएगा..हमारा ननकू”- नानी ने माँ को धीरज देते हुए कहा

“सुमन दीदी आप परेशान मत होओ..यहीं होगा…अपनी देखी हुई जगह है इतना बड़ा किनारा नहीं है”- डॉली मौसी, माँ को धीरज बँधाते हुए बोलीं..वैसे वो ख़ुद भी परेशान थीं उन्होंने नानी को सम्भाला

“नैंसी को तो जगह पता है कई बार आयी है मेरे साथ..वो कैसे गुम हुई?”- राधिका जी बोलीं

“विक्की- विन्नी, तुम दादी को लेकर बैठो और रसगुल्ला को भी रखो अपने साथ..माँ जी आप यहीं रुक जाओ”- एक बड़ी छतरी के पास डॉली मौसी नानी से बोलीं..माँ ने भी नानी को वहीं रूकने के लिए कहा और बाक़ी सब आगे निकले। विक्की और विन्नी नानी को संभाल रहे थे..नानी को ननकू की फ़िक्र हो रही थी..इसी बीच रसगुल्ला भागकर माँ के पीछे-पीछे चला गया और किसी को ध्यान ही नहीं रहा। रसगुल्ला नन्हें-नन्हें क़दमों से दौड़ लगाता हुआ माँ के पास पहुँचा और उनके पैर के पास मँडराने लगा।

माँ ने उसे प्यार से उठकर गले से लगाया और बोलीं- “कहाँ गया है तेरा ननकू..तुझे साथ भी नहीं ले गया?”- माँ की आँखों में आँसू देखकर रसगुल्ला भी उदास हो गया। माँ ने उसे नीचे उतार दिया और बोलीं- “जा तू वापस जा..विक्की- विन्नी के पास रहना..तू भी तो छोटा-सा है कहाँ भागेगा हमारे साथ..मैं ननकू को ढूँढकर लाती हूँ”

रसगुल्ला माँ की ओर देखकर रुका और फिर वो नानी के पास जाने लगा। लेकिन आधे रास्ते में ही वो रुक गया और दूसरी तरफ़ भागा..ये वही जगह थी जहाँ बच्चे मिलकर उसका घर बना रहे थे। घर पूरी तरह बना हुआ था। रसगुल्ला आसपास सूँघने लगा और पेड़ की पत्तियाँ जो ननकू और नैंसी ने लाकर लगाया था उसे सूंघकर रसगुल्ला आजू- बाज़ू सूँघने लगा और धीरे-धीरे रेत में सूँघते हुए बढ़ने लगा। ये बिलकुल अलग दिशा थी माँ और डॉली मौसी एक तरफ़ जा रहे थे और नानी विक्की- विन्नी के साथ दूसरी तरफ़ थी, रसगुल्ला जहाँ बढ़ रहा था वो अलग ही जगह थी।

सूँघते-सूँघते अपने नन्हें क़दमों से रसगुल्ला बढ़ते हुए बिलकुल अंत तक आ गया और वहाँ उसने देखा कि एक छोटी सी चट्टान है, जिसमें से अंदर जाने का रास्ता बना है। रसगुल्ला वहाँ बढ़ने लगा लेकिन उसे डर लगा..फिर रसगुल्ला को ननकू याद आया और रसगुल्ला सारे डर को एक तरफ़ रखकर चट्टान के अंदर वाले रास्ते में गया तो बहुत दूर चलकर उसने देखा कि ननकू और नैंसी बैठे हैं..बिलकुल थके हुए से..दोनों उदास दिख रहे थे..रसगुल्ला दौड़कर ननकू के पास गया और उसे चाटने लगा। ननकू ने उसे गले लगा लिया और बोला..”रसगुल्ला हम ये सुंदर-सुंदर पत्थर और शंख- सीप इकट्ठा करते-करते यहाँ तक आ गए लेकिन जाने का रास्ता नहीं पता”

“हम अब क्या करेंगे..मम्मी हमें ढूँढती होगी..हम उन्हें कैसे मिलेंगे “- नैंसी रुआंसी होकर बोली

रसगुल्ला ने दोनों को देखा और उछलने लगा..वो तो कह रहा था कि मैं आ गया हूँ दोनों को लेने..पर आज तो ननकू रसगुल्ला की बात ही नहीं सुन रहा था।

“रसगुल्ला अब तुम्हारे घर में ये सुंदर पत्थर कैसे लगेंगे?”- नैंसी बोली

“अब हम घर कैसे जाएँगे?”- ननकू बोला

रसगुल्ला आकर ननकू को चाटने लगा और उछल- उछलकर उनका ध्यान अपनी ओर करने लगा। पर वो दोनों तो उदास होकर बैठे थे।

“इससे अच्छा तो हम विक्की- विन्नी और रसगुल्ला के पास ही रहते”- नैंसी ने कहा

“हाँ..रसगुल्ला…”- अचानक से सिर उठाकर बोलता हुआ ननकू रुका और सामने रसगुल्ला को देखकर ख़ुशी से झूमता हुआ बोला “रसगुल्ला आ गया..ये हमें ढूँढता हुआ आया है”

ननकू की इस बात पर रसगुल्ला ने सिर हिलाकर हामी भरी आख़िर ननकू को उसकी बात समझ तो आयी।

“अरे वाह…नैंसी ख़ुश होकर बोली, लेकिन फिर उदास होकर बोली “पर ये इतना छोटा है अब ये भी हमारे साथ फँस गया”- वो फिर बैठ गयी

“बिलकुल नहीं..रसगुल्ला को बाहर का रास्ता ज़रूर पता होगा..”- ननकू चहकते हुए बोला..फिर रसगुल्ला को देखकर उसने विश्वास से पूछा “है न रसगुल्ला..”

रसगुल्ला उछल- उछल के बताने लगा कि उसको रास्ता पता है। बस फिर क्या था ननकू और नैंसी ने सुंदर-सुंदर कुछ पत्थर उठाए और चल पड़े रसगुल्ला के पीछे-पीछे..रसगुल्ला सूँघते-सूँघते आगे बढ़ रहा था। ननकू का मन हुआ कि उसको गोद में ले ले लेकिन रसगुल्ला तो इस समय किसी जासूस जैसा लग रहा था। आख़िर रसगुल्ला उन दोनों को ले आया बाहर जहाँ उन्हें देखते ही माँ और सभी उनकी ओर लपके। सब उनका हालचाल पूछने लगे। दोनों ने बताया कि कैसे वो दोनों रसगुल्ला का घर सजाने के लिए चीज़ें इकट्ठा करते हुए चट्टन के अंदर चले गए और उन्हें आने का रास्ता ही नहीं मिला।

“आज रसगुल्ला ने हमें खोज लिया माँ”- ननकू बोला

माँ ने प्यार से रसगुल्ला को गोद में उठाकर पुचकारा..रसगुल्ला को बहुत अच्छा लगा। ननकू ने माँ से रसगुल्ला को ले लिया और उसे प्यार से सहलाने लगा। रसगुल्ला गोद से उछल के कूदा और सीधे जाकर विक्की- विन्नी के बनाए घर में जाकर बैठ गया। सब उसे देखकर मुस्कुराने लगे। राधिका जी ने नैंसी को और माँ ने ननकू को गले से लगा लिया। ननकू ने माँ को एक सुंदर सा पत्थर देते हुए कहा

“माँ..मैं आपके लिए वहाँ से ये गिफ़्ट लाया हूँ”

“मेरा गिफ़्ट तो तू है मेरा बच्चा” कहकर माँ ने ननकू को गले से लगा लिया।

माँ और ननकू को देखकर रसगुल्ला भी दौड़कर आ गया। माँ ने उसे भी ननकू के साथ गोद में उठा लिया और ख़ूब प्यार किया। नानी ने आकर ननकू और नैंसी को गले लगाया। सब नाव की तरफ़ चले अब लौटने का समय हो गया था।

(तो पढ़ा आपने कैसे ननकू गुम हो गया था चट्टान में..वो तो अच्छा है कि उसका दोस्त रसगुल्ला वहाँ पहुँच गया और उसने नैंसी और ननकू को बाहर निकाल लाया। दोस्त चाहे कितना भी छोटा हो या बड़ा वो हमेशा काम आता है। लेकिन माँ का और बड़ों का कहना मानकर छोटे बच्चों को आसपास ही खलें चाहिए और जब दूर जाना हो तो माँ पापा को बता देना चाहिए..अब ननकू फिर नाव में सवार होकर घर जा रहा है। आपसे मिलेगा अगले क़िस्से में)

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