अक्कड़ मक्कड़

अक्कड़ मक्कड़,धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी,
बाँह उठीं और मूछें तन गयीं;
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढ़ी खींची।

अब वह जीता, अब यह जीता,
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे
सबके खिले हुए थे चेहरे!

मगर एक कोई था फक्कड़,
मन का राजा जेब से कक्कड़;
बढा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़कर।

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़;
गर्जन गूँजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा!

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लड़ने में मत खोओ
चलो भाईचारे को बोओ!

खाली सब मैदान पड़ा है,
आफ़त का शैतान खड़ा है,
ताकत ऐसे ही मत खोओ,
चलो भाईचारे को बोओ।

सुनी मूर्खों ने जब यह वाणी
दोनों हुए पानी-पानी
लड़ना छोड़ा अलग हट गए
लोग शर्म से गले, छट गए।

सबको नाहक लड़ना अखरा
ताक़त भूल गई तब नखरा
गले मिले तब अक्कड़-बक्कड़
ख़त्म हो गया धूल में धक्कड़

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़।

-भवानीप्रसाद मिश्र

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