साहित्य दुनिया सीरीज़(3): 10 शा’इर, 10 शे’र…

1.
मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई

कैफ़ी आज़मी

2.
अब इन हुदूद में लाया है इंतिज़ार मुझे
वो आ भी जाएँ तो आए न ऐतबार मुझे

ख़ुमार बाराबंकवी

3.
आँखों को सब की नींद भी दी ख़्वाब भी दिए
हम को शुमार करती रही दुश्मनों में रात

शहरयार

4.
डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा

जावेद अख़्तर

5.
किस की तलाश है हमें किस के असर में हैं
जब से चले हैं घर से मुसलसल सफ़र में हैं

आशुफ़्ता चंगेज़ी

6.
इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल
दुनिया है चल-चलाव का रस्ता सँभल के चल

बहादुर शाह ‘ज़फ़र’

7.
आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
वर्ना ये उम्र भर का सफ़र-ए-राएगाँ तो है

मुनीर नियाज़ी

8.
आज देखा है तुझ को देर के बा’द
आज का दिन गुज़र न जाए कहीं

नासिर काज़मी

9.
आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं

साहिर लुधियानवी

10.
‘मुसहफ़ी’ रात में अफ़्साना-ए-दिल कहता था,
सुन के हम-साए कई बार हँसे और रोए

मुसहफ़ी

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