कविता बाल दिवस की

रसगुल्ला और चीकू घर के बाहर के गार्डन में बैठे हैं और ननकू बैठा है बरामदे में। ननकू अपनी कॉपी में कुछ लिख रहा है और एक के बाद एक पेज में कुछ लिखकर काटता जा रहा है। रसगुल्ला और चीकू आश्चर्य से उसे देखे जा रहे हैं, रसगुल्ला से रहा नहीं गया और वो सीधे पहुँच गया ननकू के पास और ऐसे उचका कि मानो कह रहा हो कि “बस हो गया न अब तो खेलो हमारे साथ”

लेकिन ननकू ने कहा- “नहीं न रसगुल्ला, एक तो ये भी समझ में नहीं आ रहा है”

रसगुल्ला ने आँखें बड़ी करके ननकू को देखा और चुपके से उसके बाज़ू में बैठ गया मानो कह रहा हो कि “ये तो बहुत आसान है मैं अभी लिख देता हूँ” पर ननकू उसे कहाँ देख रहा था वो तो फिर से अपनी लिखाई में लग गया।

चीकू ने आवाज़ की और रसगुल्ला को देखा जैसे कि कह रहा हो “मुझे तो पहले से ही पता था तभी तो मना किया था कि मत जा पर तू मानता कहाँ है?”

रसगुल्ला ने मुँह बनाया और ननकू की तरफ़ देखा मानो कह रहा हो “अभी खेल लो न ज़रा सा देखो चीकू चिढ़ा रहा है मुझे”

लेकिन ननकू तो लगा हुआ था कुछ लिखने में, रसगुल्ला भी उसी के पास मुँह ज़मीन से लगाए बैठ गया। चीकू तो अब चला गया था दरवाज़े की तरफ़ उसे वहाँ से आते-जाते लोगों को देखने में मज़ा आता था। मन तो रसगुल्ला का भी हुआ लेकिन वो अगर जाता तो चीकू उसे चिढ़ाता बस यही सोचकर वो वहीं बैठा रह गया ननकू के पास।

रसगुल्ला सोच रहा था कि “अगर उसको ननकू की तरह पढ़ना- लिखना आता तो वो अभी झट से ननकू के लिए कुछ न कुछ लिख देता”

रसगुल्ला बैठे- बैठे एक छोटे से कीड़े को देखने लगा जो उसके पास ही आ रहा था। उसने सोचा चलो इससे ही दोस्ती की जाए लेकिन जैसे ही वो कीड़े की तरफ़ हाथ बढ़ाने लगा कि कीड़ा जल्दी- जल्दी भागने लगा। एक बार को रसगुल्ला को लगा कि वो ज़ोर से भौंककर कीड़े से बात कर ले लेकिन फिर ननकू नाराज़ हो जाता तो, बस यही सोचकर रसगुल्ला चुपचाप कीड़े को जाता हुआ देखने लगा। उसने देखा दरवाज़े से दादी आ रही हैं।

ख़ज़ाना-ए-क़ाफ़िया

दादी ने चुप बैठे रसगुल्ला को देखकर प्यार से पूछा “क्या हुआ ननकू?..रसगुल्ला तुझे क्या हुआ?” इतना सुनते ही रसगुल्ला सीधे भागता हुआ दादी की गोद में चढ़ गया और उन्हें भौंक- भौंक कर सारी बात बताने लगा।

“अच्छा..ननकू तेरे साथ खेल नहीं रहा है? क्या लिख रहा है?..चल देखते हैं”

रसगुल्ला तो दादी की गोद में ही उछ्लने लगा। दादी उसे लिये हुए ननकू के पास पहुँची और पास की कुर्सी में बैठते हुए ननकू के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं- “क्या हुआ ननकू, क्या लिख रहा है? क्यों काट रहा है बार-बार? क्या हुआ बच्चे”

दादी ने प्यार से बात की तो ननकू ने कॉपी से सिर उठाकर कहा “दादी, टीचर बोली हैं कि बाल दिवस पर एक कविता लिखकर सुनानी है, फिर उसको याद करके बाल दिवस पर सुनाना है”

“अरे वाह..तो तू इतना काट क्यों रहा है?”

“कुछ भी अच्छे से नहीं लिखा रहा है”- ननकू उदास होते हुए बोला

“बाल दिवस पर कविता लिखना है, तो इतना सोचना क्यों है..बाल दिवस मतलब बचपन की बात..और तू तो मेरा लाडला बचपन में ही है..”

ननकू आँखें बड़ी करके दादी की बातें सुन रहा था और रसगुल्ला भी बाज़ू में बैठा उनकी बातें सुन रहा था। रसगुल्ला को पता था कि अब दादी आ गयी हैं तो ननकू जल्दी से उसके साथ खेलने लगेगा। चीकू भी पास आकर बैठ गया।

“पर दादी लिखूँ क्या..?”- ननकू ने पूछा

“अरे..लिखना क्या है ये कोई पूछता है? बस लिख दे जो रोज़ घर में होता है..तेरी शैतानी के बारे में लिख दे “- दादी ने प्यार से ननकू का गाल छूते हुए कहा

दादी की बात सुनते- सुनते ननकू की आँखों में चमक आ गयी..वो चिल्लाया “दादी कविता समझ में आ गयी..”

अच्छा..बता तो..”- दादी ने पूछा

“बच्चे हैं हम करते हैं शैतानी रोज़ मिठाई देती है हमें दादी..”- ननकू ने कहा और सोचने लगा “नहीं..नहीं..बच्चे हैं हम करते हैं शैतानी रोज़ मिठाई देती हैं हमें नानी..”- ननकू चहकते हुए बोला

“अच्छा जी, नानी रोज़ आती हैं मिठाई देने?” दादी ने छेड़ा

“दादी वो तो..” ननकू सोचने लगा

“अरे बाबा, तू लिख ले”- दादी ने प्यार से कहा

अब ननकू लिखने लगा। दादी रसगुल्ला के साथ खेलने लगीं। ननकू ने कहा- “दादी, हो गयी कविता पूरी..सुनाऊँ?

“हाँ..हाँ भई..सुना..आ जाओ तुम दोनों”

दादी ने चीकू को भी ऊपर बुला लिया रसगुल्ला तो दादी कि गोद में उछलने लगा था। अब ननकू भी तैयार थी अपनी कविता के साथ, वो सुनाने लगा अपनी कविता

“बच्चे हैं हम करते हैं शैतानी
रोज़ मिठाई देती हैं हमें नानी,
दादी सुनाती हैं कहानियाँ परियों की
माँ दिखाती हैं रौनक़ गलियों की,
सुपर हीरो हैं पापा हमारे
जेब में भरते हैं लाखों सितारे,
रसगुल्ला और चीकू की बात
सुनते-सुनते हो जाती है रात,
ऐसा प्यारा है बचपन हमारा
नानी, दादी माँ पापा का दुलारा”

कविता ख़त्म होते ही रसगुल्ला दौड़कर ननकू की गोद में चढ़ गया और उसे चाटने लगा। चीकू भी कहाँ पीछे रहने वाला था वो भी चढ़ गया ननकू पर, दादी उन्हें देखकर हँसने लगी सबकी आवाज़ सुनकर माँ भी दरवाज़े तक आ गयी और उनकी मस्ती देखने लगीं।

(बाल दिवस यानी बचपन को जीने का त्योहार, जैसे ननकू, चीकू और रसगुल्ला के साथ दादी, माँ और पापा जीते हैं बस कुछ ऐसा ही है बचपन और बाल दिवस। तो बाल दिवस पर ज़रूरी नहीं है बड़ी- बड़ी बातों वाले भाषण और कविता की ये तो त्योहार है बचपन की सरलता को जीने का..आप सभी को ननकू और उसकी टीम की ओर से बाल दिवस की शुभकामनाएँ) 

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