दो शा’इर, दो ग़ज़लें (5): जलील मानिकपुरी और परवीन शाकिर…

उर्दू शा’इरी के जिन दो शा’इरों की ग़ज़लें हम आज पेश कर रहे हैं, वो हैं परवीन शाकिर और जलील मानिकपुरी.

परवीन शाकिर की ग़ज़ल..

बहुत रोया वो हमको याद कर के,
हमारी ज़िंदगी बरबाद कर के

पलट कर फिर यहीं आ जाएँगे हम,
वो देखे तो हमें आज़ाद कर के

रिहाई की कोई सूरत नहीं है,
मगर हाँ मिन्नत-ए-सय्याद कर के

बदन मेरा छुआ था उसने लेकिन
गया है रूह को आबाद कर के

हर आमिर तूल देना चाहता है,
मुक़र्रर ज़ुल्म की मीआ’द कर के

[रदीफ़- कर के]
[क़ाफ़िये- याद, बरबाद, आज़ाद, मिन्नत ए सय्याद, आबाद, मीआ’द]

जलील मानिकपुरी की ग़ज़ल

बात साक़ी की न टाली जाएगी,
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी

दिल लिया पहली नज़र में आप ने,
अब अदा कोई न ख़ाली जाएगी

आते आते आएगा उन को ख़याल,
जाते जाते बे-ख़याली जाएगी

क्या कहूँ दिल तोड़ते हैं किस लिए,
आरज़ू शायद निकाली जाएगी

देखते हैं ग़ौर से मेरी शबीह,
शायद उस में जान डाली जाएगी

ऐ तमन्ना तुझ को रो लूँ शाम-ए-वस्ल,
आज तू दिल से निकाली जाएगी

फ़स्ल-ए-गुल आई जुनूँ उछला ‘जलील
अब तबीअ’त कुछ सँभाली जाएगी

[रदीफ़- जायेगी]
[क़ाफ़िये- टाली, डाली, ख़ाली, बे-ख़याली, निकाली, डाली, निकाली, सँभाली]

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