“गुटर-गुटर-गूँ बोल कबूतर”

गुटर-गुटर-गूँ बोल, कबूतर,
कानों में रस घोल, कबूतर।

बैठा तू छत की मुँडेर पर
देख रहा क्या लचक-लचककर,
बोल जरा, मैं भी तो सुन लूँ
गीत तेरा अनमोल, कबूतर!

तूने सिखलाया है गाना
मुक्त हवा में उड़े जाना,
तुझसे हमने सीख लिया है
आजादी का मोल, कबूतर!

जा, उस डाली पर भी कहना
प्यारे भाई, मिल-जुल रहना,
मस्ती से गर्दन लहराकर-
पंख सजीले तोल, कबूतर!


प्रकाश मनु

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