दो शा’इर, दो ग़ज़लें(8): अहमद फ़राज़ और बहज़ाद लखनवी…

अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल: अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम,
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम

सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था,
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब,
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम

तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़,
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम

वो लोग अब कहाँ हैं जो कहते थे कल ‘फ़राज़,
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे भी रुलाएँ हम

[रदीफ़- हम]
[क़ाफ़िये- बढ़ाएँ,  जाएँ, सदाएँ, जाएँ, लुटाएँ , रुलाएँ]

 

बहज़ाद लखनवी की ग़ज़ल: ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए,
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए

ऐ दिल की ख़लिश चल यूँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में,
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए

ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे,
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए

हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना,
इस राह-ए-मोहब्बत में कोई दरपेश जो मुश्किल आ जाए

इस जज़्बा-ए-दिल के बारे में इक मशवरा तुम से लेता हूँ,
उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मिरा दिल आ जाए

ऐ बर्क़-ए-तजल्ली कौंध ज़रा क्या तू ने मुझ को भी मूसा समझा है,
मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाए

आता है जो तूफ़ाँ आने दो कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है,
मुमकिन तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए

[रदीफ़- आ जाए]
[क़ाफ़िये- मुक़ाबिल, मंज़िल,  महफ़िल, मंज़िल, मुश्किल, दिल, मुक़ाबिल, साहिल]

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