घनी कहानी, छोटी शाखा: उषा प्रियम्वदा की कहानी ‘वापसी’ का पहला भाग..

वापसी (उषा प्रियम्वदा)
भाग-1

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई – दो बक्‍से, डोलची, बालटी – “यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?” उन्होंने पूछा।
गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दुःख, कुछ लज्जा से बोला, “घरवाली ने साथ को कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसंद थे। अब कहाँ हम ग़रीब लोग, आपकी कुछ ख़ातिर कर पाएँगे।“

घर जाने की ख़ुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया, जैसे एक परिचित, स्‍नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा हो। “कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा” गनेशी बिस्‍तर में रस्‍सी बाँधता हुआ बोला। “कभी कुछ जरूरत हो तो लिखना गनेशी। इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो” गनेशी ने अँगोछे के छोर से आँखें पोंछीं, “अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा? आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता” गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेलवे क्‍वार्टर का यह कमरा, जिसमें उन्‍होंने कितने वर्ष बिताए थे, उनका सामान हट जाने से कुरूप और नग्‍न लग रहा था। आँगन में रोपे पौधे भी जान-पहचान के लोग ले गए थे और जगह-जगह मिट्टी बिखरी हुई थी। पर पत्नी, बाल-बच्‍चों के साथ रहने की कल्‍पना में यह बिछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठ कर विलीन हो गया। गजाधर बाबू ख़ुश थे, बहुत ख़ुश। पैंतीस साल की नौकरी के बाद वह रिटायर हो कर जा रहे थे। इन वर्षों में अधिकांश समय उन्‍होंने अकेले रह कर काटा था। उन अकेले क्षणों में उन्‍होंने इसी समय की कल्‍पना की थी, जब वह अपने परिवार के साथ रह सकेंगे। इसी आशा के सहारे वह अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे। संसार की दृष्टि में उनका जीवन सफल कहा जा सकता था। उन्‍होंने शहर में एक मकान बनवा लिया था, बड़े लड़के अमर और लड़की कांति की शादियाँ कर दी थीं, दो बच्‍चे ऊँची कक्षाओं में पढ़ रहे थे। गजाधर बाबू नौकरी के कारण प्रायः छोटे स्‍टेशनों पर रहे और उनके बच्‍चे और पत्‍नी शहर में, जिससे पढ़ाई में बाधा न हो। गजाधर बाबू स्‍वभाव से बहुत स्‍नेही व्‍यक्ति थे और स्‍नेह के आकांक्षी भी। जब परिवार साथ था, ड्यूटी से लौट कर बच्‍चों से हँसते-बोलते, पत्‍नी से कुछ मनोविनोद करते, उन सबके चले जाने से उनके जीवन में गहन सूनापन भर उठा। ख़ाली क्षणों में उनसे घर में टिका न जाता। कवि प्रकृति के न होने पर भी उन्‍हें पत्‍नी की स्‍नेहपूर्ण बातें याद आती रहतीं। दोपहर में गर्मी होने पर भी, दो बजे तक आग जलाए रहती और उनके स्‍टेशन से वापस आने पर गरम-गरम रोटियाँ सेंकती… उनके खा चुकने और मना करने पर भी थोड़ा-सा कुछ और थाली में परोस देती, और बड़े प्‍यार से आग्रह करती। जब वह थके-हारे बाहर से आते, तो उनकी आहट पा वह रसोई के द्वार पर निकल आती और उसकी सलज्‍ज आँखें मुस्‍करा उठतीं। गजाधर बाबू को तब हर छोटी बात भी याद आती और वह उदास हो उठते… अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था, जब वह फिर उसी स्‍नेह और आदर के मध्‍य रहने जा रहे थे।

टोपी उतार कर गजाधर बाबू ने चारपाई पर रख दी, जूते खोल कर नीचे खिसका दिए, अंदर से रह-रह कर कहकहों की आवाज आ रही थी। इतवार का दिन था और उनके सब बच्‍चे इकठ्ठे हो कर नाश्‍ता कर रहे थे। गजाधर बाबू के सूखे चेहरे पर स्निग्‍ध मुस्‍कान आ गई, उसी तरह मुस्कराते हुए वह बिना खाँसे अंदर चले आए। उन्‍होंने देखा कि नरेंद्र कमर पर हाथ रखे शायद गत रात्रि की फिल्‍म में देखे गए किसी नृत्‍य की नकल कर रहा था और बसंती हँस-हँस कर दुहरी हो रही थी। अमर की बहू को अपने तन-बदन, आँचल या घूँघट का कोई होश न या और वह उन्‍मुक्‍त रूप से हँस रही थी। गजाधर बाबू को देखते ही नरेंद्र धप-से बैठ गया और चाय का प्‍याला उठा कर मुँह से लगा लिया। बहू को होश आया और उसने झट से माथा ढक लिया, केवल बसंती का शरीर रह-रह कर हँसी दबाने के प्रयत्‍न में हिलता रहा। गजाधर बाबू ने मुस्कराते हुए उन लोगों को देखा। फिर कहा, “क्‍यों नरेंद्र, क्‍या नकल हो रही थी?”

“कुछ नहीं बाबूजी” नरेंद्र ने सिटपिटा कर कहा।

गजाधर बाबू ने चाहा था कि वह भी इस मनोविनोद में भाग लेते, पर उनके आते ही जैसे सब कुंठित हो चुप हो गए। उससे उनके मन में थोड़ी-सी खिन्‍नता उपज आई। बैठते हुए बोले, “बसंती, चाय मुझे भी देना। तुम्‍हारी अम्‍मा की पूजा अभी चल रही है क्‍या?” बसंती ने माँ की कोठरी की ओर देखा, “अभी आती ही होंगी” , और प्‍याले में उनके लिए चाय छानने लगी। बहू चुपचाप पहले ही चली गई थी, अब नरेंद्र भी चाय का आखिरी घूँट पी कर उठ खड़ा हुआ, केवल बसंती, पिता के लिहाज में, चौके में बैठी माँ की राह देखने लगी। गजाधर बाबू ने एक घूँट चाय पी, फिर कहा, “बिट्टी – चाय तो फीकी है” “लाइए चीनी और डाल दूँ” बसंती बोली।
“रहने दो, तुम्‍हारी अम्‍मा जब आएगी, तभी पी लूँगा” थोड़ी देर में उनकी पत्‍नी हाथ में अर्घ्य का लोटा लिए निकली और अशुद्ध स्‍तुति कहते हुए तुलसी में डाल दिया। उन्‍हें देखते ही बसंती भी उठ गई। पत्‍नी ने आ कर गजाधर बाबू को देखा और कहा, “अरे, आप अकेले बैठे हैं – ये सब कहाँ गए?”

गजाधर बाबू के मन में फाँस-सी करक उठी, “अपने-अपने काम में लग गए है – आख़िर बच्‍चे ही है” पत्‍नी आ कर चौके में बैठ गईं, उन्‍होंने नाक-भौं चढ़ा कर चारों ओर जूठे बर्तनों को देखा। फिर कहा, “सारे में जूठे बर्तन पड़े हैं। इस घर में धरम-धरम कुछ नहीं। पूजा करके सीधे चौके में घुसो” फिर उन्‍होंने नौकर को पुकारा, जब उत्‍तर न मिला तो एक बार और उच्‍च स्‍वर में, फिर पति की ओर देख कर बोलीं, “बहू ने भेजा होगा बाजार” और एक लंबी साँस ले कर चुप हो रहीं। गजाधर बाबू बैठ कर चाय और नाश्‍ते का इंतजार करते रहे। उन्‍हें अचानक ही गनेशी की याद आ गई। रोज सुबह, पैसेंजर आने से पहले वह गरम-गरम पूरियाँ और जलेबी बनाता था। गजाधर बाबू जब तक उठ कर तैयार होते, उनके लिए जलेबियाँ और चाय ला कर रख देता था। चाय भी कितनी बढ़िया, काँच के गिलास में ऊपर तक भरी लबालब, पूरे ढाई चम्‍मच चीनी और गाढ़ी मलाई। पैसेंजर भले ही रानीपुर लेट पहुँचे, गनेशी ने चाय पहुँचाने में कभी देर नहीं की। क्‍या मजाल कि कभी उससे कुछ कहना पड़े। पत्‍नी का शिकायत-भरा स्‍वर सुन उनके विचारों में व्‍याघात पहुँचा। वह कह रही थीं, “सारा दिन इसी खिच-खिच में निकल जाता है। इस गृहस्‍थी का धंधा पीटते-पीटते उमर बीत गई। कोई जरा हाथ भी नहीं बँटाता”..“बहू क्‍या किया करती है?” गजाधर बाबू ने पूछा। “पड़ी रहती है। बसंती को तो, फिर कहो कॉलेज जाना होता है”

गजाधर बाबू ने जोश में आकर बसंती को आवाज़ दी। बसंती भाभी के कमरे से निकली तो गजाधर बाबू ने कहा, “बसंती, आज से शाम का खाना बनाने की ज़िम्मेदारी तुम पर है। सुबह का भोजन तुम्हारी भाभी बनाएगी”

बसंती मुँह लटकाकर बोली, “बाबूजी, पढ़ना भी तो होता है” गजाधर बाबू ने प्‍यार से समझाया, “तुम सुबह पढ़ लिया करो। तुम्‍हारी माँ बूढ़ी हुईं, उनके शरीर में अब वह शक्ति नहीं बची हैं। तुम हो, तुम्‍हारी भाभी हैं, दोनों को मिलकर काम में हाथ बँटाना चाहिए” बसंती चुप रह गई। उसके जाने के बाद उसकी माँ ने धीरे से कहा, “पढ़ने का तो बहाना है। कभी जी ही नहीं लगता। लगे कैसे? शीला से ही फुरसत नहीं, बड़े-बड़े लड़के हैं उनके घर में, हर वक़्त वहाँ घुसा रहना, मुझे नहीं सुहाता। मना करूँ तो सुनती नहीं” नाश्‍ता कर गजाधर बाबू बैठक में चले गए। घर छोटा था और ऐसी व्‍यवस्‍था हो चुकी थी कि उसमें गजाधर बाबू के रहने के लिए कोई स्‍थान न बचा था। जैसे किसी मेहमान के लिए कुछ अस्‍थायी प्रबंध कर दिया जाता है, उसी प्रकार बैठक में कुर्सियों को दीवार से सटाकर बीच में गजाधर बाबू के लिए पतली-सी चारपाई डाल दी गई थी। गजाधर बाबू उस कमरे में पड़े-पड़े, कभी-कभी अनायास ही, इस अस्‍थायित्‍व का अनुभव करने लगते। उन्‍हें याद हो आती उन रेलगाड़ियों की, जो आतीं और थोड़ी देर रुक कर किसी और लक्ष्‍य की ओर चली जातीं।

क्रमशः

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(इस कहानी के सर्वाधिकार लेखिका के पास सुरक्षित हैं। इस कहानी को यहाँ शामिल करने का एकमात्र उद्देश्य इसे ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों के पास पहुँचाना है। इससे किसी की भी भावना को ठेस पहुँचाने का हमारा कोई इरादा नहीं है। अगर आपको किसी भी तरह की कोई आपत्ति हो तो हमें sahitydunia@gmail.com पर सम्पर्क करें।)

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