घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ का तीसरा भाग..

ईदगाह (मुंशी प्रेमचंद)
भाग -तीन

(इससे पहले आपने पढ़ा हामिद, जो अपनी दादी अमीना के साथ गाँव में रहता है, ईद के मौक़े पर सिर्फ़ तीन पैसे साथ लिए अपने दोस्तों के साथ ईदगाह आया है। हर तरफ़ रौनक़ है और तरह-तरह के झूले, खिलौने मिठाई आदि से बाज़ार सजा है, हामिद के दोस्त इन सारी चीज़ों का आनंद उठा रहे हैं लेकिन हामिद अपने तीन पैसों को यूँ ही ख़र्च नहीं करना चाहता, वो दोस्तों को अपने तर्क से ये जता देता है कि ये सारी चीज़ें व्यर्थ हैं पर इतनी समझ रखते हुए भी आख़िर उसका बाल-मन दोस्तों को देखकर ललचता तो है। अब आगे..)

खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ ली हैं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहन हलवा, सब मज़े से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक् है। अभागे के पास तीन पैसे हैं, क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सब की ओर देखता है।
मोहसिन कहता है—“हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी ख़ूशबूदार है!”
हामिद को संदेह  हुआ, ये केवल क्रूर विनोद है मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद नूरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसियाकर रह जाता है।
मोहसिन—“अच्छा, अबकी ज़रूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा”
हामिद—“रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं?”
सम्मी—“तीन ही पैसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगे?”
महमूद—“हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है”
हामिद—“मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं”
मोहसिन—“लेकिन दिल में कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?”
महमूद—“सब समझते हैं, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा”
मिठाइयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नक़ली गहनों की। लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पर रूक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख़याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है, तवे से रोटियॉँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे ख़राब होते हैं। ज़रा देर ही तो ख़ुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई ऑंख उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाऍंगे। चिमटा कितने काम की चीज़ है। रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो। कोई आग माँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्माँ बेचारी को कहाँ फ़ुर्सत है कि बाज़ार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलते हैं? रोज़ हाथ जला लेती हैं।

हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सबके सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं, इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलो, मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाऍं मिठाइयॉँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही ज़बान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हैं।मेरी ज़बान क्यों ख़राब होगी?
अम्माँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्माँ के लिए चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआऍं देगा? बड़ों की दुआऍं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। मैं भी इनके मिज़ाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाता। आखिर अब्बाजान कभी न कभी आऍंगे। अम्मी भी ऑंएगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखाऊँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जाता है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हँसे! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछा—“यह चिमटा कितने का है?”
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—“तुम्हारे काम का नहीं है जी!”
“बिकाऊ है कि नहीं?”
“बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?”
“तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?”
“छ: पैसे लगेंगे”
हामिद का दिल बैठ गया।
“ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो”
हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा- “तीन पैसे लोगे?”
यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दी, बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। ज़रा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाऍं करते हैं!

मोहसिन ने हँसकर कहा—“यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?”
हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—“ज़रा अपना भिश्ती ज़मीन पर गिरा दो। सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा क्या?”
महमूद बोला—“तो यह चिमटा कोई खिलौना है?”
हामिद—“खिलौना क्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फ़क़ीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मंजीरे का काम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका नही कर सकते, मेरा बहादुर शेर है चिमटा।
सम्मी ने खँजरी ली थी, प्रभावित होकर बोला—“मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।“
हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-“मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खँजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी, ज़रा-सा पानी लग जाए तो ख़त्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी में, तूफ़ान में बराबर डटा खड़ा रहेगा”
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी हो रही है बाप से ज़िद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक, इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।
क्रमशः

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[फ़ोटो क्रेडिट(फ़ीचर्ड इमेज): प्रियंका शर्मा]

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