घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी “सोहाग का शव” का दूसरा भाग

सोहाग का शव- मुंशी प्रेमचंद

भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा..ये कहानी मध्यप्रदेश के एक छोटे से पहाड़ी गाँव की है। केशव जो मुंबई यूनिवर्सिटी से एम. ए. की डिग्री पाकर अब नागपुर में अध्यापन का काम करता है और वो अपने घर आया हुआ है। सुभद्रा और उसके विवाह की पहली वर्षगाँठ है, वैसे तो इस साल भर के साथ सफ़र में दोनों बस केशव की छुट्टियों में चार-चार दिनों की मुलाक़ात ही कर पाए हैं। लेकिन केशव के आने का एक कारण ये भी है कि उसे इंग्लैंड में अपनी शिक्षा प्राप्त करने के लिए वृत्ति मिल गयी है, जहाँ शहर में उसे इस बात के लिए ढेर सारी बधाइयाँ मिलीं वहीं घर में उलाहने। केशव भी जाने या न जाने को लेकर एक असमंजस में है लेकिन सुभद्रा पति का मान बढ़ते देखने का एक मौक़ा नहीं खोना चाहती और वो ज़िद्द करके घर में सभी से केशव के जाने की इजाज़त भी माँग़ चुकी है, इसके लिए उसे कई बातें सुननी पड़ी लेकिन वो केशव का सम्मान बढ़ते हुए देखने का मौक़ा नहीं खोना चाहती। एक बार को वो भी तीन वर्ष के लम्बे समय को अकेले बिताने के ख़याल से डगमगाती है पर फिर भी वो अपने निश्चय पर अटल है। आख़िर केशव की गाड़ी आ पहुँचती है और वो सुभद्रा को रोज़ ख़त भेजने का वादा करके रवाना होता है। सुभद्रा की आँखों में अब मानो सावन की झड़ी लग गयी है। अब आगे…)

दिन गुज़रने लगे। उसी तरह, जैसे बीमारी के दिन कटते हैं—दिन पहाड़ रात काली बला। रात-भर मनाते गुज़रती थी कि किसी तरह भोर होता, तो मनाने लगती कि जल्दी शाम हो। मैके गयी कि वहाँ जी बहलेगा। दस-पाँच दिन परिवर्तन का कुछ असर हुआ, फिर उनसे भी बुरी दशा हुई, भागकर ससुराल चली आयी। रोगी करवट बदलकर आराम का अनुभव करता है।
पहले पाँच छह महीनों तक तो केशव के पत्र पंद्रहवें दिन बराबर मिलते रहे। उसमें वियोग के दु:ख कम, नये-नये दृश्यों का वर्णन अधिक होता था। पर सुभद्रा संतुष्ट थी। पत्र लिखती, तो विरह-व्यथा के सिवा उसे कुछ सूझता ही न था। कभी-कभी जब जी बेचैन हो जाता, तो पछताती कि व्यर्थ जाने दिया। कहीं एक दिन मर जाऊँ, तो उनके दर्शन भी न हों।

लेकिन छठे महीने से पत्रों में भी विलम्ब होने लगा। कई महीने तक तो महीने में एक पत्र आता रहा, फिर वह भी बंद हो गया। सुभद्रा के चार-छह पत्र पहुँच जाते, तो एक पत्र आ जाता; वह भी बेदिली से लिखा हुआ—काम की अधिकता और समय के अभाव के रोने से भरा हुआ। एक वाक्य भी ऐसा नहीं, जिससे हृदय को शांति हो, जो टपकते हुए दिल पर मरहम रखे।
“हा ! आदि से अन्त तक ‘प्रिये’ शब्द का नाम नहीं”- सुभद्रा अधीर हो उठी। उसने यूरोप-यात्रा का निश्चय कर लिया। वह सारे कष्ट सह लेगी, सिर पर जो कुछ पड़ेगी सह लेगी; केशव को आँखों से देखती रहेगी। वह इस बात को उनसे गुप्त रखेगी, उनकी कठिनाइयों को और न बढ़ायेगी, उनसे बोलेगी भी नहीं ! केवल उन्हें कभी-कभी ऑंख भर कर देख लेगी। यही उसकी शांति के लिए काफ़ी होगा। उसे क्या मालूम था कि उसका केशव उसका नहीं रहा। वह अब एक दूसरी ही कामिनी के प्रेम का भिखारी है।

सुभद्रा कई दिनों तक इस प्रस्ताव को मन में रखे हुए सेती रही। उसे किसी प्रकार की शंका न होती थी। समाचार-पत्रों के पढ़ते रहने से उसे समुद्री यात्रा का हाल मालूम होता रहता था। एक दिन उसने अपने सास-ससुर के सामने अपना निश्चय प्रकट किया। उन लोगों ने बहुत समझाया, रोकने की बहुत चेष्टा की; लेकिन सुभद्रा ने अपना हठ न छोड़ा। आख़िर जब लोगों ने देखा कि यह किसी तरह नहीं मानती, तो राजी हो गये। मैकेवाले समझा कर हार गये। कुछ रूपये उसने स्वयं जमा कर रखे थे, कुछ ससुराल में मिले। मॉँ-बाप ने भी मदद की। रास्ते के ख़र्च की चिंता न रही। इंग्लैंड पहुँचकर वह क्या करेगी, इसका अभी उसने कुछ निश्चय न किया। इतना जानती थी कि परिश्रम करने वाले को रोटियों की कहीं कमी नहीं रहती।

विदा होते समय सास और ससुर दोनों स्टेशन तक आए। जब गाड़ी ने सीटी दी, तो सुभद्रा ने हाथ जोड़कर कहा— “मेरे जाने का समाचार वहॉँ न लिखिएगा। नहीं तो उन्हें चिंता होगी ओर पढ़ने में उनका जी न लगेगा”
ससुर ने आश्वासन दिया। गाड़ी चल दी।

लंदन के उस हिस्से में, जहॉँ इस समृद्धि के समय में भी दरिद्रता का राज्य हैं, ऊपर के एक छोटे से कमरे में सुभद्रा एक कुर्सी पर बैठी है। उसे यहॉँ आये आज एक महीना हो गया है। यात्रा के पहले उसके मन मे जितनी शंकाएँ थी, सभी शान्त होती जा रही है। बम्बई-बंदर में जहाज़ पर जगह पाने का प्रश्न बड़ी आसानी से हल हो गया। वह अकेली औरत न थी जो यूरोप जा रही हो। पाँच-छह स्त्रियाँ और भी उसी जहाज़ से जा रही थीं। सुभद्रा को न जगह मिलने में कोई कठिनाई हुई, न मार्ग में। यहाँ पहुँचकर और स्त्रियों से संग छूट गया। कोई किसी विद्यालय में चली गयी; दो-तीन अपने पतियों के पास चलीं गयीं, जो यहाँ पहले आ गये थे। सुभद्रा ने इस मुहल्ले में एक कमरा ले लिया। जीविका का प्रश्न भी उसके लिए बहुत कठिन न रहा। जिन महिलाओं के साथ वह आयी थी, उनमे कई उच्च- अधिकारियों की पत्नियाँ थी। कई अच्छे-अच्छे अंग्रेज़ घरानों से उनका परिचय था। सुभद्रा को, दो महिलाओं को भारतीय संगीत और हिन्दी-भाषा सिखाने का काम मिल गया। शेष समय मे वह कई भारतीय महिलाओं के कपड़े सीने का काम कर लेती है।

केशव का निवास-स्थान यहाँ से निकट है, इसीलिए सुभद्रा ने इस मुहल्ले को पंसद किया है। कल केशव उसे दिखायी दिया था। ओह ! उन्हें ‘बस’ से उतरते देखकर उसका चित्त कितना आतुर हो उठा था। बस यही मन में आता था कि दौड़कर उनके गले से लिपट जाय और पूछे— “क्यों जी, तुम यहाँ आते ही बदल गए। याद है, तुमने चलते समय क्या-क्या वादा किये थे?”- उसने बड़ी मुश्किल से अपने को रोका था। तब से इस वक़्त तक उसे मानो नशा-सा छाया हुआ है, वह उनके इतने समीप है ! चाहे रोज़ उन्हें देख सकती है, उनकी बातें सुन सकती है; हाँ, स्पर्श तक कर सकती है। अब यह उससे भाग कर कहाँ जायेगें? उनके पत्रों की अब उसे क्या चिन्ता है। कुछ दिनों के बाद सम्भव है वह उनसे होटल के नौकरों से जो चाहे, पूछ सकती है।

क्रमशः

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