घनी कहानी छोटी शाखा: किशोरीलाल गोस्वामी की लिखी कहानी “इन्दुमती” का अंतिम भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता  है। अभी कुछ दिन “घनी कहानी छोटी शाखा” में शामिल कर रहे हैं ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं, “किशोरीलाल गोस्वामी” की लिखी कहानी “इन्दुमती”..आज पढ़िए चौथा और अंतिम भाग)

इन्दुमती- किशोरीलाल गोस्वामी 

भाग-4

(अब तक आपने पढ़ा..बचपन से पिता के साथ विंध्याचल के जंगलों में अकेली रहती इन्दुमती जब जंगल में मिले अनजान युवक को घर ले आती है तो उसे पिता के क्रोध का सामना करना पड़ता है और वो युवक भी बंदी बना लिया जाता है। पिता के इस स्वभाव को देखकर इंदुमती को बहुत दुःख होता है। मन ही मन वो इस युवक पर मोहित भी है और वो हर प्रकार से उसकी मदद भी करती है। पिता द्वारा दिए अथक परिश्रम के काम में भी हाथ बँटाती है और उसे पिता की आज्ञा के विरुद्ध जाकर अच्छे फल, साफ़ जल खिलाती-पिलाती भी है। इधर पिता का एक अलग रूप सामने आता है जब वो अपने साथियों के साथ बात करते हैं और उन्हें बताते हैं कि ये युवक अजयगढ़ का राजकुमार चंद्रशेखर है और वो इन्दुमती के प्रति चंद्रशेखर के प्रेम को जाँच रहे हैं। उन्हें दोनों का प्रेम सच्चा मालूम होता है। पिता के इस रूप से अनजान इन्दुमती चंद्रशेखर के साथ फलाहार करती है और दोनों चट्टान पर बैठकर बातों में ही रात बिता देते हैं। अब आगे…)

सवेरा होते ही युवक कुठार ले लकड़ी काटने लगा और इन्दुमती सारा काम छोड़कर खड़ी-खड़ी उसके मुख की ओर देखने लगी। थोड़ी ही देर में युवक के सारे शरीर से पसीना टपकने लगा और चेहरा लाल हो आया। इतने में वृद्ध ने आकर गरजकर कहा-

“ओ लड़के! बस, पेड़ पीछे काटियो, पहिले जो लकड़ियाँ काटी हैं, उन्हें उठाकर कुटी के पिछवाड़े ढेर लगा दे”- इतना कहकर बुड्ढा चला गया और युवक लकड़ी उठा-उठा कर कुटी के पीछे ढेर लगाने लगा। उसका इतना परिश्रम इन्दुमती से न देखा गया और बड़े प्रेम से वह उसका हाथ थामकर बोली- “प्यारे, ठहरो, बस करो, बाकी लकडियाँ मैं रख आती हूँ। हाय, तुम्हारा परिश्रम देखकर मेरी छाती फटी जाती है। प्यारे, तुम राजकुमार होकर आज लकड़ी काटते हो, ठहरो, तुम सुस्ता लो”

युवक ने मुस्कराकर कहा- “प्यारी, सावधान, ऐसा भूलकर भी न करना। अपने पिता का क्रोध याद करो। अब की उन्होंने तुम्हें लकड़ी उठाते या हमसे बोलते देख लिया तो सर्वनाश हो जाएगा”

इतना सुनकर इन्दुमती की आँखों में आँसू भर आए। वह बोली- “प्यारे, मेरे पिता का तो बहुत अच्छा स्वभाव था, सो तुम्हें देखते ही एकदम से ऐसा बदल क्यों गया? वह तो ऐसे नहीं थे, अब उन्हें क्या हो गया? आज तक मैंने उन्हें कभी क्रोध करते नहीं देखा था। ख़ैर, जो होय, पर तुम ठहरो, दम ले लो, तब तक मैं इन लकड़ियों को फेंक देती हूँ”

युवक ने कहा- “प्यारी, क्या राक्षस हूँ कि अपनी आँखों के सामने तुम्हें लकड़ी ढोने दूँगा? हटो, ऐसा नहीं होगा। सच जानो तुम्हें देखने से मुझे कुछ भी कष्ट नहीं जान पड़ता”

इन्दुमती ने उदास होकर कहा, “हाय प्यारे, तुम्हारे दुःख देखकर मेरे हृदय में ऐसी वेदना होती है कि क्या कहूँ, जो तुम इसे जानते तो ऐसा न कहते”

पीछे लता-मण्डप में खड़े-खड़े वृद्ध ने दोनों की बातें सुनकर बड़ा सुख माना, पर अंतिम परीक्षा करने के अभिप्राय में नंगी तलवार ले सामने आ, गरजकर कहा,- “इन्दुमती, कल से आज तक तैंने मेरी सब बातों का उलट बर्ताव किया। फल और जल की बात याद कर, और तू फिर इससे बात करती है? देख अब तेरा सिर काटता हूँ” – कहकर ज्यों ही वह इन्दुमती की ओर बढ़ा कि चट युवक उसके पाँव पकड़कर कहने लगा-

“आप अपने क्रोध को दूर करने के लिए मुझे मारिए, सब दोष मेरा है, मैं दण्ड के योग्य हूँ। यह सब तरह निरपराधिनी है। मेरा सिर आपके पैरों पर है, काट लीजिए; पर मेरे सामने एक निरपराध लड़की के प्राण न  लीजिए”

वृद्ध ज्यों ही अपनी तलवार युवक की गर्दन पर रखना चाहता था कि इन्दुमती पागल की तरह उसके चरणों पर गिर बिलख-बिलखकर रोने और कहने लगी – “पिता, पिता, जो मारना ही है तो पहले मेरा सिर काट लो तो फिर पीछे जो जी में आवे सो करना”

इतना सुन बुड्ढे ने तलवार दूर फेंक दी और दोनों को उठा गले लगाकर कहा- “बेटी इन्दुमती! धीरज, धर और प्रिय वत्स! चंद्रशेखर! खेद दूर करो। मैंने केवल तुम दोनों के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए सब प्रकार का क्रोध का भाव दिखलाया था। यदि तुम दोनों का सच्चा प्रेम न होता तो क्यों एक-दूसरे के लिए जान पर खेलकर क्षमा चाहते, और सुनो, मैंने छिपकर तुम्हारी सब बातें सुनी हैं। तुमसे बढ़कर संसार में दूसरा कौन राजकुमार है जो इन्दुमती के वर बनने योग्य होगा। सुनो, देवगढ़ मेरे पुरखाओं की राजधानी थी। जबकि इन्दुमती चार वर्ष की थी, पापी इब्राहिम ने मेरे नगर को घेर यह कहलाया कि ‘या तो अपनी स्त्री (इन्दुमती की माँ) को भेज दो या जंग करो..यह सुनकर मेरी आँखों में ख़ून उतर आया और उसके दूत को मैंने निकलवा दिया। फिर क्या पूछना था! सारा नगर यवन हत्यारों के हाथ से शमशान हो गया। मेरी स्त्री ने आत्महत्या की और मैं उस यवन-कुल-कलंक से बदला लेने की इच्छा से चार वर्ष की अबोध लड़की को ले इस जंगल में आकर रहने लगा। मेरे कृतज्ञ सरदारों में से पचास आदमियों ने सर्वस्व त्यागकर मेरा साथ दिया और आज तक मेरे साथ हैं। उन्हीं लोगों में से कई आदमियों को तुमने कल देखा था।”

“बेटा चंद्रशेखर! बारह वर्ष हो गए पर ऐसी सावधानी से मैंने इस लड़की का लालन-पालन किया और इसे पढ़ाया-लिखाया कि जिसका सुख तुम्हें आप आगे चलकर इसकी सुशीलता से जान पड़ेगा। और देखो, मैंने इसे ऐसे पहरे में रखा कि कल के सिवा और कभी इसने मुझे छोड़कर किसी दूसरे मनुष्य की सूरत न देखी। मैंने राजस्थान के सब राजाओं से सहायता माँगी और यह कहलाया कि जो कोई दुष्ट इब्राहिम का सिर काट लावेगा उसे अपनी लड़की ब्याह दूँगा। पर हा! किसी ने मेरी बात न सुनी और सभी मुझे पागल समझकर हँसने लगे। अंत में मैंने दुःखी होकर प्रतिज्ञा की कि जो कोई इब्राहिम को मारेगा उसी से इन्दुमती ब्याही जाएगी, नहीं तो यह जन्म भर कुँआरी ही रहेगी। सो परमेश्वर ने तुम्हारे हृदय में बैठकर मेरी प्रतिज्ञा पूरी की। अब इन्दुमती तुम्हारी हुई। और आज मैं बड़े भारी बोझ को उतारकर आजन्म के लिए हल्का हो गया”

इतना कह बुड्ढे ने सीटी बजायी और देखते-देखते पचास जवान हथियारों से सजे, घोड़ों पर सवार आ खडे हुए। उनके साथ एक सजा हुआ घोड़ा चंद्रशेखर के लिए और एक सुंदर पालकी इन्दुमती के लिए थी। इसी समय बुड्ढे ने दोनों का विवाह कर उन वीरों के साथ विदा किया और आप हिमालय की ओर चला गया।

अहा! जो इन्दुमती इतने दिनों तक वन-विहंगिनी थी, वह आज घर के पिंजरे में बंद होने चली। परमेश्वर की महिमा का कौन पार पा सकता है!

समाप्त

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!