घनी कहानी छोटी शाखा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” का पाँचवा भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है।अभी कुछ दिन “घनी कहानी छोटी शाखा” में हम शामिल कर रहे हैं ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं, “आचार्य रामचंद्र शुक्ल” की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” ..आज पढ़िए पाँचवा और अंतिम भाग) 

ग्यारह वर्ष का समय-आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

 भाग-5

(अब तक आपने पढ़ा..घूमते हुए एक खंडहर तक आ पहुँचे दो मित्रों को उस खंडहर में एक स्त्री नज़र आती है। उनके पूछने पर वो स्त्री उन्हें अपने जीवन के दुःख सुनाने लगती है। किस तरह इस भरेपूरे गाँव को एक प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा और कैसे उस जल में उस स्त्री का भविष्य भी बह गया। पति से मिलन के पूर्व ही इस आपदा में वो खो गया। समय बीतते रहे और पिता के घर में कष्ट पाकर भी वो स्त्री सहती रही लेकिन एक दिन जब सहना न हो पाया तो वो वहाँ से निकल आयी। कोई और राह न पाकर वो अपने पति के घर का दर्शन करने की अभिलाषा लिए इस खंडहर में आ गयी एक कोठरी पाकर वो यहीं बस गयी। उसके मन में न कोई अभिलाषा बची और न ही जीने की इच्छा, उसकी इस कथा को सुनकर जहाँ लेखक का हृदय दुःख से भर उठता है वहीं उनके मित्र के भाव कुछ लगा ही रूप लेते हैं। आख़िर इस अलग भाव का क्या रहस्य है, आइए जानते हैं आगे..) 

मैंने देखा, मेरे मित्र का चित्त भीतर-ही-भीतर आकुल और संतप्त हो रहा था; हृदय का वेग रोककर उन्होंने प्रश्न किया, “क्यों! तुम्हें अपने पति का कुछ स्मरण है?”

स्त्री के नेत्रों से अनर्गल वारिधारा प्रवाहित हुई। बड़ी कठिनतापूर्वक उसने उत्तर दिया- “मैं उस समय बालिका थी। विवाह के समय मैंने उन्हें देखा था। वह मूर्ति यद्यपि मेरे हृदय–मंदिर में विद्यमान है; प्रचण्ड काल भी उसको वहाँ से हटाने में असमर्थ है”

मेरे मित्र ने कहा- “देवि ! तुमने बहुत कुछ रहस्य प्रकट किया; जो कुछ शेष है उसका वर्णन कर अब मैं इस कथा की पूर्ति करता हूँ”

स्त्री विस्मयोत्सुक लोचनों से मेरे मित्र की ओर निहारने लगी। मैं भी आश्चर्य से उन्हीं की ओर देखने लगा। उन्होंने कहना आरम्भ किया –

“इस आख्यानिका में यही ज्ञात होना शेष है कि चंद्रशेखर मिश्र के पुत्र की क्या दशा हुई। चंद्रशेखर मिश्र और उनकी पत्नी का क्या हुआ? सुनो, नाव पर मिश्र जी ने अपने पुत्र को अपने साथ ही बैठाया। नाव पर भीड़ अधिक हो जाने के कारण वह उनसे पृथक् हो गया। उन्होंने समझा कि वह नाव ही पर है; कोई चिंता नहीं। इधर मनुष्यों की धक्का-मुक्की से वह लड़का नाव पर से नीचे जा रहा। ठीक उसी समय मल्लाह ने नाव खोल दी। उसने कई बेर अपने पिता को पुकारा; किंतु लोगों के कोलाहल में उन्हें कुछ सुनाई न दिया। नाव चली गयी। बालक वहीं खड़ा रह गया और लोग किसी प्रकार अपना-अपना प्राण लेके इधर-उधर भागे। नीचे भयानक जलप्रवाह; ऊपर अनन्त आकाश। लड़के ने एक छप्पर को बहते हुए अपनी ओर आते देखा; तुरंत वह उसी पर बैठ गया। इतने में जल का एक बहुत ऊँचा प्रबल झोंका आया। छप्पर लड़के सहित शीघ्र गति से बहने लगा। वह चुपचाप मूर्तिवत् उसी पर बैठा रहा। उसे यह ध्यान नहीं कि इस प्रकार कै दिन तक वह बहता गया। वह भय और दुविधा से संज्ञाहीन हो गया था। संयोगवश एक व्यापारी की नाव, जिस पर रूई लदी थी, पूरब की ओर जा रही थी। नौका का स्वामी भी बजरे ही पर था। उसकी दृष्टि उस लड़के पर पड़ी। वह उसे नाव पर ले गया। लड़के की अवस्था‍ उस समय मृतप्राय थी। अनेक यत्न के उपरांत वह होश में लाया गया। उस सज्जन ने लड़के की नाव पर बड़ी सेवा की। नौका बराबर चलती रही; बीच में कहीं न रुकी; कई दिनों के उपरांत कलकत्ते पहुँची।

“वह बंगाली सज्जन उस लड़के को अपने घर पर ले गया और उसे उसने अपने परिवार में सम्मिलित किया। बालक ने अपने माता-पिता के देखने की इच्छा प्रकट की। उसने उसे बहुत समझाया और शीघ्र अनुसंधान करने का वचन दिया। लड़का चुप हो रहा”

“इसी प्रकार कई मास व्यतीत हो गए। क्रमश: वह अपने पास के लोगों में हिल-मिल गया। बंगाली महाशय के एक पुत्र था। दोनों में भ्रातृ–स्नेह स्थापित हो गया। वह सज्जन उस लड़के के भावी हित की चेष्टा में तत्पर हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थापित किए हुए एक अँग्रेजी स्कूल में अपने पुत्र के साथ-साथ उसे भी वह शिक्षा देने लगा। क्रमश: उसे अपने घर का ध्यान कम होने लगा। वह दत्तचित्त होकर शिक्षा में अपना सारा समय देने लगा। इसी बीच कई वर्ष व्यतीत हो गए। उसके चित्त में अब अन्य प्रकार के विचारों ने निवास किया। अब पूर्व परिचित लोगों के ध्यान के लिए उसके मन में कम स्थान शेष रहा। मनुष्य का स्वभाव ही इस प्रकार का है। नौ वर्ष का समय निकल गया”

“इसी बीच में एक बड़ी चित्ताकर्षक घटना उपस्थित हुई। बंगदेशी सज्जन के उस पुत्र का विवाह हुआ। चंद्रशेखर का पुत्र भी उस समय वहाँ उपस्थित था। उसने सब देखा; दीर्घकाल की निद्रा भंग हुई। सहसा उसे ध्यान हो आया, “मेरा भी विवाह हुआ है;अवश्य हुआ है”- उसे अपने विवाह का बारम्बार ध्या‍न आने लगा। अपनी पाणिग्रहीता भार्या का भी उसे स्मरण हुआ। स्वदेश में लौटने को उसका चित्त आकुल होने लगा। रात्रि-दिन इसी चिंता में व्यतीत होने लगे।

हमारे कतिपय पाठक हम पर दोषारोपण करेंगे कि-  “हैं! न कभी साक्षात् हुआ, न वार्तालाप हुआ, न लंबी-लंबी कोर्टशिप हुई; यह प्रेम कैसा?”- महाशय, रुष्ट न होईए। इस अदृष्ट प्रेम का धर्म और कर्तव्य से घनिष्ठ संबंध है। इसकी उत्पत्ति केवल सदाशय और नि:स्वारर्थ हृदय में ही हो सकती है। इसकी जड़ संसार के और प्रकार के प्रचलित प्रेमों से दृढ़तर और अधिक प्रशस्तता है। आपको संतुष्ट करने को मैं इतना और कहे देता हूँ कि इंग्लैंड  के भूतपूर्व प्रधानमंत्री लार्ड बेकन्सफील्ड का भी यही मत था”

“युवक का चित्त अधिक डाँवाडोल होने लगा। एक दिन उसने उस देवतुल्‍य सज्जन पुरुष से अपने चित्त की अवस्था प्रकट की और बहुत विनय के साथ विदा माँगी। आज्ञा पाकर उसने स्वदेश की ओर यात्रा की, देश में आने पर उसे विदित हुआ कि ग्राम में अब कोई नहीं है। उसने लोगों से अपने पिता-माता के विषय में पूछताछ किया। कुछ थोड़े दिन हुए वे दोनों इस नगर में थे; और अब वे तीर्थ-स्थानों में देशाटन कर रहे हैं। वह अपनी धर्मपत्नी के दर्शनों की अभिलाषा से सीधे काशी गया। वहाँ तुम्हारे पिता के घर का वह अनुसंधान करने लगा। बहुत दिनों के पश्चात तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता से उसका साक्षात हुआ, जिससे तुम्हारे संसार से सहसा लोप हो जाने की बात ज्ञात हुई। वह निराश होकर संसार में घूमने लगा”

इतना कहकर मेरे मित्र चुप हो रहे। इधर शेष भाग सुनने को हम लोगों का चित्त ऊब रहा था; आश्चर्य से उन्हीं की ओर हम ताक रहे थे। उन्होंने फिर उस स्त्री की ओर देखकर कहा, “कदाचित तुम पूछोगी कि इस समय अब वह कहाँ है? यह वही अभागा मनुष्य तुम्हारे सम्मुख बैठा है”

हम दोनों के शरीर में बिजुली-सी दौड़ गयी; वह स्त्री भूमि पर गिरने लगी; मेरे मित्र ने दौड़कर उसको सँभाला। वह किसी प्रकार उन्हीं के सहारे बैठी। कुछ क्षण के उपरांत उसने बहुत धीमे स्वर से मेरे मित्र से कहा- “अपना हाथ दिखाओ”

उन्होंने चट अपना हाथ फैला दिया, जिस पर एक काला तिल दिखाई दिया। स्त्री कुछ काल तक उसी की ओर देखती रही; फिर मुख ढाँपकर सिर नीचा करके बैठी रही। लज्जा का प्रवेश हुआ क्योंकि यह एक हिंदू-रमणी का उसके पति के साथ प्रथम संयोग था।

आज इतने दिनों के उपरांत मेरे मित्र का गुप्त रहस्य प्रकाशित हुआ। उस रात्रि को मैं अपने मित्र का खँडहर में अतिथि रहा। सवेरा होते ही हम सब लोग प्रसन्नचित्त नगर में आए।

समाप्त

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