घनी कहानी, छोटी शाखा- जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘अघोरी का मोह’ का अंतिम भाग

अघोरी का मोह (जयशंकर प्रसाद)
भाग-2
(अब तक आपने पढ़ा..गंगा घाट पर ललित और किशोर की मुलाक़ात होती है। सामाजिक धन वैभव की कमी न होने पर भी ललित का मन दुखी और गम्भीर है, इसका कारण कोई नहीं जानता, किशोर भी नहीं। फिर भी ललित को किशोर के साथ एक अपनेपन का एहसास है। इस घटना के 25 वर्ष बाद गंगा के तट पर ही गाँव वाले एक अघोरी को देखते हैं जो। कभी किसी से कुछ नहीं माँगता। पंचवटी के इस अघोरी के विषय में तरह-तरह की बातें प्रचलित हैं पर उनमें कितनी सच्चाई है ये किसी को पता नहीं है। अब आगे..)

शीत-काल है। मध्याह्न है। सवेरे से अच्छा कुहरा पड़ चुका है। नौ बजने के बाद सूर्य का उदय हुआ है। छोटा-सा बजरा अपनी मस्तानी चाल से जाह्नवी के शीतल जल में सन्तरण कर रहा है। बजरे की छत पर तकिये के सहारे कई बच्चे और स्त्री-पुरुष बैठे हुए जल-विहार कर रहे हैं।
कमला ने कहा- “भोजन कर लीजिए, समय हो गया है।”
किशोर ने कहा- “बच्चों को खिला दो, अभी और दूर चलने पर हम खाएँगे।”
बजरा जल से कल्लोल करता हुआ चला जा रहा है। किशोर शीतकाल के सूर्य की किरणों से चमकती हुई जल-लहरियों को उदासीन अथवा स्थिर दृष्टि से देखता हुआ न जाने कब की और कहाँ की बातें सोच रहा है। लहरें क्यों उठती हैं और विलीन होती हैं, बुदबुद और जल-राशि का क्या सम्बन्ध है? मानव-जीवन बुदबुद है कि तरंग?..बुदबुद है, तो विलीन होकर फिर क्यों प्रकट होता है? मलिन अंश फेन कुछ जलबिन्दु से मिलकर बुदबुद का अस्तित्व क्यों बना देता है? क्या वासना और शरीर का भी यही सम्बन्ध है? वासना की शक्ति? कहाँ-कहाँ किस रूप में अपनी इच्छा चरितार्थ करती हुई जीवन को अमृत-गरल का संगम बनाती हुई अनन्त काल तक दौड़ लगायेगी? कभी अवसान होगा, कभी अनन्त जल-राशि में विलीन होकर वह अपनी अखण्ड समाधि लेगी? ….. हैं, क्या सोचने लगा? व्यर्थ की चिन्ता। उहँ।”
नवल ने कहा- “बाबा, ऊपर देखो। उस वृक्ष की जड़ें कैसी अद्‌भुत फैली हुई हैं।”
किशोर ने चौंक कर देखा। वह जीर्ण वृक्ष, कुछ अनोखा था। और भी कई वृक्ष ऊपर के करारे को उसी तरह घेरे हुए हैं, यहाँ अघोरी की पंचवटी है।
किशोर ने कहा- “नाव रोक दे। हम यहीं ऊपर चलकर ठहरेंगे। वहीं जलपान करेंगे।”
थोड़ी देर में बच्चों के साथ किशोर और कमला उतरकर पञ्चवटी के करारे पर चढऩे लगे।
सब लोग खा-पी चुके। अब विश्राम करके नाव की ओर पलटने की तैयारी है। मलिन अंग, किन्तु पवित्रता की चमक, मुख पर रुक्षकेश, कौपीनधारी एक व्यक्ति आकर उन लोगों के सामने खड़ा हो गया।
“मुझे कुछ खाने को दो।”- दूर खड़ा हुआ गाँव का एक बालक उसे माँगते देखकर चकित हो गया। वह बोला,
“बाबू जी, यह पंचवटी के अघोरी हैं।”
किशोर ने एक बार उसकी ओर देखा, फिर कमला से कहा- “कुछ बचा हो, तो इसे दे दो।”
कमला ने देखा, तो कुछ पराँठे बचे थे। उसने निकालकर दे दिया।
किशोर ने पूछा- “और कुछ नहीं है?”
उसने कहा- “नहीं।”
अघोरी उस सूखे पराँठे को लेकर हँसने लगा। बोला- “हमको और कुछ न चाहिए।”
फिर एक खेलते हुए बच्चे को गोद में उठा कर चूमने लगा। किशोर को बुरा लगा। उसने कहा- “उसे छोड़ दो, तुम चले जाओ।”
अघोरी ने हताश दृष्टि से एक बार किशोर की ओर देखा और बच्चे को रख दिया। उसकी आँखें भरी थीं, किशोर को कुतूहल हुआ। उसने कुछ पूछना चाहा, किन्तु वह अघोरी धीरे-धीरे चला गया। किशोर कुछ अव्यवस्थित हो गये। वह शीघ्र नाव पर सब को लेकर चले आये।
नाव नगर की ओर चली। किन्तु किशोर का हृदय भारी हो गया था। वह बहुत विचारते थे, कोई बात स्मरण करना चाहते थे, किन्तु वह ध्यान में नहीं आती थी-उनके हृदय में कोई भूली हुई बात चिकोटी काटती थी, किन्तु वह विवश थे। उन्हें स्मरण नहीं होता था। मातृ-स्नेह से भरी हुई कमला ने सोचा कि हमारे बच्चों को देखकर अघोरी को मोह हो गया।

समाप्त

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