घनी कहानी छोटी शाखा: किशोरीलाल गोस्वामी की लिखी कहानी “इन्दुमती” का तीसरा भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता  है। अभी कुछ दिन “घनी कहानी छोटी शाखा” में शामिल कर रहे हैं ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं, “किशोरीलाल गोस्वामी” की लिखी कहानी “इन्दुमती”..आज पढ़िए तीसरा भाग)

इन्दुमती- किशोरीलाल गोस्वामी 

भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा..दुनिया के वजूद से बेख़बर, अपने पिता के अलावा किसी और को न देखी हुई इन्दुमती विंध्याचल के जंगलों में रहती है, एक रोज़ उन्हीं जंगलों में किसी भटके हुए मुसाफ़िर से उसकी मुलाक़ात होती है जिसे वो अपना अतिथि बनाकर घर ले आती है। उसके पिता इस बात पर ऐसा क्रोध करते हैं जो इन्दुमती के लिए नया है। इन्दुमती के पिता उस युवक को बंदी की तरह रखते हैं और उससे परिश्रम का कार्य करवाते हैं। इन्दुमती इस बात से दुखी है और वो बार-बार उस युवक की मदद करने पहुँच जाती है, जिसके कारण उसे भी पिता के क्रोध का सामना करना पड़ता है। इन्दुमती एक ओर पिता के इस प्रकार के क्रोध से हैरान है वहीं दूसरी ओर उस युवक की ओर आकर्षित, लेकिन उसकी इस दशा से दुखी। अब आगे…) 

इन्दुमती बोली कि “घबराओ मत, मेरे रहते तुम्हारा बाल भी बाँका न होगा”

और युवक ने कहा-  “प्यारी, क्यों व्यर्थ मेरे लिए कष्ट सहती हो? जाओ, कुटी में जाओ”- पर इन्दुमती उसके मुँह की ओर उदास हो देखने लगी और वह कुठार उठाकर पेड़ काटने लगा। इतने ही में फिर बाहर आकर बुड्ढा बोला-

“ओ छोकरे! सन्ध्या भई, अब रहने दे। पर देख, कल दिन-भर में जो सारा पेड़ न काट डाला तो देखियो मैं क्या करता हूँ। और सुनती है, री इन्दुमती! इसे कुटी में ले जाकर सड़े-गले फल खाने को और गँदला पानी पीने को दे। परंतु सावधान! मुख से एक अक्षर भी न निकलने पावे। और सुन बे लड़के! खबरदार, जो इससे कुछ भी बातचीत की तो जीता न छोडूँगा”- यह कहकर बुड्ढा पहाड़ी पगडण्डी से गंगा तट की ओर उतरने लगा और उसके जाने पर इन्दुमती मुसकाकर युवा का हाथ थामे हुई कुटी के भीतर गई और वहाँ जाकर उसने पिता की आज्ञा को मेट कर सड़े-गले फल और गँदले पानी के बदल अच्छे-अच्छे मीठे फल और सुंदर साफ पानी युवक को दिया। और युवक के बहुत आग्रह करने पर दोनों ने साथ फलाहार किया। फिर दोनों बुड्ढे के आने में देर समझ बाहर चाँदनी में एक साथ ही चट्टान पर बैठकर बातें करने लगे।

रात जा चुकी थी, वन में चारों ओर भयानक बनैले जंतुओं के गरजने की ध्वनि फैल रही थी। चार आदमी हाथ में तलवार और बरछा लिए कुटी के चारों ओर पहरा दे रहे थे। कुटी से थोड़ी ही दूर पर एक ढलुआ चोटी पर दस-बारह आदमी बातें कर रहे थे। चलिए पाठक! देखिए ये लोग क्या बातें करते हैं। आहा! यह देखिए! इन्दुमती का पिता एक चटाई पर बैठा है और सामने दस-बारह आदमी हाथ बाँधे जमीन पर बैठे हैं। बड़ी देर सन्नाटा रहा, फिर बूढ़े ने कहा –

“सुनो भाइयो! इतने दिनों पीछे परमेश्वर ने हमारा मनोरथ पूरा किया। जो बात एक प्रकार से अनहोनी थी सो आपसे आप हो गई। यह परमेश्वर ने ही किया; नहीं तो बिचारी इन्दुमती का बेड़ा पार कैसे लगा। देखो, जिस युवक की रखवाली के लिए आज तीसरे पहर मैंने तुम लोगों से कहा था, वह अजयगढ़ का राजकुमार, या यों कहो कि अब राजा है। इसका नाम चंद्रशेखर है। इसके पिता राजशेखर को उसी बेईमान काफ़िर इब्राहिम लोधी ने दिल्ली में बुला, विश्वासघात कर मार डाला था; तब से यह लड़का इब्राहिम की घात में लगा था। अभी थोड़े दिन हुए जो बाबर से इब्राहिम की लड़ाई हुई है, उसमें चंद्रशेखर ने भेष बदल और इब्राहिम की सेना में घुसकर उसे मार डाला। यह बात कहीं एक सेनापति ने देख ली और उसने चंद्रशेखर का पीछा किया। निदान यह भागा और कई दिन पीछे उसे द्वन्द्व युद्व में मार अपने घोड़े को गँवा, राह भूलकर अपने राज्य की ओर न जाकर इस ओर आया और कल मेरी कन्या का अतिथि बना। आज उसने यह सब ब्योरा जलपान करते-करते इन्दुमती से कहा, जिसे मैंने आड़ में खड़े होकर सब सुना। वे दोनों एक-दूसरे को जी से चाहने लगे हैं। तो इस बात के अतिरिक्त और क्या कहा जाय कि परमेश्वर ही ने इन्दुमती का जोड़ा भेज दिया है और साथ ही उस दयामय ने मेरी भी प्रतिज्ञा पूरी की”-

इतना सुनकर सभी ने जय ध्वनि के साथ हर्ष प्रकट किया और बूढ़ा फिर कहने लगा – “मेरी इन्दुमती सोलह वर्ष की हुई, अब उसे कुँआरी रखना किसी तरह उचित नहीं है और ऐसी अवस्था में जबकि मेरी प्रतिज्ञा भी पूरी हुई और इन्दुमती के योग्य सुपात्र वर भी मिला। उसने इन्दुमती से प्रतिज्ञा की है कि ‘प्यारी, मैं तुम्हें प्राण से बढ़कर चाहूँगा और दूसरा विवाह भी न करूँगा, जिससे तुम्हें सौत की आग में न जलना पड़े”

“भाइयो! देखो स्त्री के लिए इससे बढ़कर कौन बात सुख देनेवाली है! मैंने जो चंद्रशेखर को देखकर इतना क्रोध प्रकट किया था उसका आशय यही था कि यदि दोनों में सच्चा प्रीति का अंकुर जमेगा तो दोनों का ब्याह कर दूँगा, और जो ऐसा न हुआ तो युवक आप डर के मारे भाग जाएगा। परंतु यहाँ तो परमेश्वर को इन्दुमती का भाग्य खोलना था और ऐसा ही हुआ। बस, कल ही मैं दोनों का ब्याह करके हिमालय चला जाऊँगा और तुम लोग वर-कन्या को उनके घर पहुँचाकर अपने-अपने घर जाना। बारह वर्ष तक जो तुम लोगों ने तन-मन-धन से मेरी सेवकाई की इसका ऋण सदा मेरे सिर पर रहेगा और जगदीश्वर इसके बदले में तुम लोगों के साथ भलाई करेगा”- इतना कहकर बुड्ढा उठ खड़ा हुआ और वे लोग भी उठे। बुड्ढा कुटी की ओर घूमा और वे लोग पहाड़ी के नीचे उतर गए।

“अहा! प्रेम!! तू धन्य है !!! जिस इन्दुमती ने आज तक देवता की भाँति अपने पिता की सेवा की, और भूलकर भी कभी आज्ञा न टाली, आज वह प्रेम के फंदे में फँसकर उसका उलटा वर्ताव करती है।”

वृद्ध ने लौटकर क्या देखा कि दोनों कुटी के पिछवाड़े चाँदनी में बैठे बातें कर रहे हैं। यह देख वह प्रसन्न हुआ और कुटी में जाकर सो रहा। पर हमारे दोनों नए प्रेमियों ने बातों ही में रात बिता दी।

क्रमशः

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