घनी कहानी, छोटी शाखा: जयशंकर प्रसाद की कहानी “पुरस्कार” का दूसरा भाग

पुरस्कार-जयशंकर प्रसाद

भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा..कौशल राज्य का कृषि-उत्सव चल रहा है, जिसमें एक दिन के लिए राजा कृषक बनकर एक खेत जोतते और रोपते हैं, जिसके लिए गाँव के ही किसी किसान का उपजाऊ खेत चुना जाता है, बाद में जिसका खेत हो उसे राजा चौगुना मूल्य देकर खेत राज्य के नाम कर लेता है और जिसका खेत हो वो वहाँ खेती का काम करता है, राजा ही उसका बाक़ी ख़र्च उठाते हैं। इस वर्ष उत्सव में मधूलिका का खेत चुना जाता है। लेकिन जब उसे राजा चौगुना धन देना चाहते हैं तो वो उस धन को राजा के ऊपर ही वार देती है और अपने खेत को बेचने से मना करके उसे यूँ ही बिना मूल्य राज्य को देने की बात कहती है। इस पर मंत्री उसे कुछ बातें कहते हैं तो वो निर्भिकता से उनके सवालों का जवाब देती है। ये सारी घटना वहाँ आया मगध का राजकुमार अरूण देख रहा होता है। अगले दिन वो मधूलिका से मिलने आता है किंतु मधूलिका उसे दो टूक जवाब देकर विदा कर देती है। इस बात से सिर्फ़ अरूण ही नहीं बल्कि मधूलिका ख़ुद भी दुखी होती है। अब आगे..)

मधूलिका ने राजा का प्रतिपादन, अनुग्रह नहीं लिया। वह दूसरे खेतों में काम करती और चौथे पहर रूखी-सूखी खाकर पड़ रहती। मधूक-वृक्ष के नीचे छोटी-सी पर्णकुटीर थी। सूखे डंठलों से उसकी दीवार बनी थी। मधूलिका का वही आश्रय था। कठोर परिश्रम से जो रूखा अन्न मिलता, वही उसकी साँसों को बढ़ाने के लिए पर्याप्त था।
दुबली होने पर भी उसके अंग पर तपस्या की कान्ति थी। आस-पास के कृषक उसका आदर करते। वह एक आदर्श बालिका थी। दिन, सप्ताह, महीने और वर्ष बीतने लगे।

शीतकाल की रजनी, मेघों से भरा आकाश, जिसमें बिजली की दौड़-धूप। मधूलिका का छाजन टपक रहा था! ओढऩे की कमी थी। वह ठिठुरकर एक कोने में बैठी थी। मधूलिका अपने अभाव को आज बढ़ाकर सोच रही थी। जीवन से सामञ्जस्य बनाये रखने वाले उपकरण तो अपनी सीमा निर्धारित रखते हैं; परन्तु उनकी आवश्यकता और कल्पना भावना के साथ बढ़ती-घटती रहती है। आज बहुत दिनों पर उसे बीती हुई बात स्मरण हुई। दो, नहीं-नहीं, तीन वर्ष हुए होंगे, इसी मधूक के नीचे प्रभात में-तरुण राजकुमार ने क्या कहा था?

वह अपने हृदय से पूछने लगी-उन चाटुकारी के शब्दों को सुनने के लिए उत्सुक-सी वह पूछने लगी- “क्या कहा था?”- दु:ख-दग्ध हृदय उन स्वप्न-सी बातों को स्मरण रख सकता था? और स्मरण ही होता, तो भी कष्टों की इस काली निशा में वह कहने का साहस करता। हाय री बिडम्बना!

आज मधूलिका उस बीते हुए क्षण को लौटा लेने के लिए विकल थी। दारिद्रय की ठोकरों ने उसे व्यथित और अधीर कर दिया है। मगध की प्रासाद-माला के वैभव का काल्पनिक चित्र-उन सूखे डंठलों के रन्ध्रों से, नभ में-बिजली के आलोक में-नाचता हुआ दिखाई देने लगा। खिलवाड़ी शिशु जैसे श्रावण की सन्ध्या में जुगनू को पकड़ने के लिए हाथ लपकाता है, वैसे ही मधूलिका मन-ही-मन कर रही थी। “अभी वह निकल गया” –

वर्षा ने भीषण रूप धारण किया। गड़गड़ाहट बढ़ने लगी; ओले पड़ने की सम्भावना थी। मधूलिका अपनी जर्जर झोपड़ी के लिए काँप उठी। सहसा बाहर कुछ शब्द हुआ-
“कौन है यहाँ?”
“पथिक को आश्रय चाहिए”
मधूलिका ने डंठलों का कपाट खोल दिया। बिजली चमक उठी। उसने देखा, एक पुरुष घोड़े की डोर पकड़े खड़ा है। सहसा वह चिल्ला उठी- “राजकुमार!”
“मधूलिका?” -आश्चर्य से युवक ने कहा।
एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। मधूलिका अपनी कल्पना को सहसा प्रत्यक्ष देखकर चकित हो गई -“इतने दिनों के बाद आज फिर!”
अरुण ने कहा- “कितना समझाया मैंने-परन्तु…..”
मधूलिका अपनी दयनीय अवस्था पर संकेत करने देना नहीं चाहती थी। उसने कहा- “और आज आपकी यह क्या दशा है?”
सिर झुकाकर अरुण ने कहा- “मैं मगध का विद्रोही निर्वासित कौशल में जीविका खोजने आया हूँ”
मधूलिका उस अन्धकार में हँस पड़ी- “मगध के विद्रोही राजकुमार का स्वागत करे एक अनाथिनी कृषक-बालिका, यह भी एक विडम्बना है, तो भी मैं स्वागत के लिए प्रस्तुत हूँ”
शीतकाल की निस्तब्ध रजनी, कुहरे से धुली हुई चाँदनी, हाड़ कँपा देनेवाला समीर, तो भी अरुण और मधूलिका दोनों पहाड़ी गह्वर के द्वार पर वट-वृक्ष के नीचे बैठे हुए बातें कर रहे हैं। मधूलिका की वाणी में उत्साह था, किन्तु अरुण जैसे अत्यन्त सावधान होकर बोलता।
मधूलिका ने पूछा- “जब तुम इतनी विपन्न अवस्था में हो, तो फिर इतने सैनिकों को साथ रखने की क्या आवश्यकता है?”
“मधूलिका! बाहुबल ही तो वीरों की आजीविका है। ये मेरे जीवन-मरण के साथी हैं, भला मैं इन्हें कैसे छोड़ देता? और करता ही क्या?”
“क्यों? हम लोग परिश्रम से कमाते और खाते। अब तो तुम…”
“भूल न करो, मैं अपने बाहुबल पर भरोसा करता हूँ। नये राज्य की स्थापना कर सकता हूँ। निराश क्यों हो जाऊँ?” -अरुण के शब्दों में कम्पन था; वह जैसे कुछ कहना चाहता था; पर कह न सकता था।
“नवीन राज्य! ओहो, तुम्हारा उत्साह तो कम नहीं। भला कैसे? कोई ढंग बताओ, तो मैं भी कल्पना का आनन्द ले लूँ”
“कल्पना का आनन्द नहीं मधूलिका, मैं तुम्हे राजरानी के सम्मान में सिंहासन पर बिठाऊँगा! तुम अपने छिने हुए खेत की चिन्ता करके भयभीत न हो”
एक क्षण में सरल मधूलिका के मन में प्रमाद का अन्धड़ बहने लगा-द्वन्द्व मच गया। उसने सहसा कहा- “आह, मैं सचमुच आज तक तुम्हारी प्रतीक्षा करती थी, राजकुमार!”
अरुण ढिठाई से उसके हाथों को दबाकर बोला- “तो मेरा भ्रम था, तुम सचमुच मुझे प्यार करती हो?”
युवती का वक्षस्थल फूल उठा, वह हाँ भी नहीं कह सकी, ना भी नहीं। अरुण ने उसकी अवस्था का अनुभव कर लिया। कुशल मनुष्य के समान उसने अवसर को हाथ से न जाने दिया। तुरन्त बोल उठा- “तुम्हारी इच्छा हो, तो प्राणों से पण लगाकर मैं तुम्हें इस कौशल-सिंहासन पर बिठा दूँ। मधूलिके! अरुण के खड्ग का आतंक देखोगी?” -मधूलिका एक बार काँप उठी। वह कहना चाहती थी..नहीं; किन्तु उसके मुँह से निकला-“क्या?”

“सत्य मधूलिका, कौशल-नरेश तभी से तुम्हारे लिए चिन्तित हैं। यह मैं जानता हूँ, तुम्हारी साधारण-सी प्रार्थना वह अस्वीकार न करेंगे। और मुझे यह भी विदित है कि कौशल के सेनापति अधिकांश सैनिकों के साथ पहाड़ी दस्युओं का दमन करने के लिए बहुत दूर चले गये हैं”
मधूलिका की आँखों के आगे बिजलियाँ हँसने लगी। दारुण भावना से उसका मस्तक विकृत हो उठा। अरुण ने कहा- “तुम बोलती नहीं हो?”
“जो कहोगे, वह करूँगी….”- मन्त्रमुग्ध-सी मधूलिका ने कहा।
स्वर्णमञ्च पर कौशल नरेश अर्द्धनिद्रित अवस्था में आँखे मुकुलित किये हैं। एक चामधारिणी युवती पीछे खड़ी अपनी कलाई बड़ी कुशलता से घुमा रही है। चामर के शुभ्र आन्दोलन उस प्रकोष्ठ में धीरे-धीरे सञ्चलित हो रहे हैं। ताम्बूल-वाहिनी प्रतिमा के समान दूर खड़ी है।

प्रतिहारी ने आकर कहा- “जय हो देव! एक स्त्री कुछ प्रार्थना लेकर आई है”
आँख खोलते हुए महाराज ने कहा- “स्त्री! प्रार्थना करने आई? आने दो”
प्रतिहारी के साथ मधूलिका आई। उसने प्रणाम किया। महाराज ने स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा और कहा- “तुम्हें कहीं देखा है?”
“तीन बरस हुए देव! मेरी भूमि खेती के लिए ली गई थी”
“ओह, तो तुमने इतने दिन कष्ट में बिताये, आज उसका मूल्य माँगने आई हो, क्यों? अच्छा-अच्छा तुम्हें मिलेगा। प्रतिहारी!”
“नहीं महाराज, मुझे मूल्य नहीं चाहिए”
“मूर्ख! फिर क्या चाहिए?”
“उतनी ही भूमि, दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की जंगली भूमि, वहीं मैं अपनी खेती करूँगी। मुझे एक सहायक मिल गया है। वह मनुष्यों से मेरी सहायता करेगा, भूमि को समतल भी बनाना होगा”
महाराज ने कहा- “कृषक बालिके! वह बड़ी उबड़-खाबड़ भूमि है। तिस पर वह दुर्ग के समीप एक सैनिक महत्व रखती है”
“तो फिर निराश लौट जाऊँ?”
“सिंहमित्र की कन्या! मैं क्या करूँ, तुम्हारी यह प्रार्थना….”
“देव! जैसी आज्ञा हो!”
“जाओ, तुम श्रमजीवियों को उसमें लगाओ। मैं अमात्य को आज्ञापत्र देने का आदेश करता हूँ”
“जय हो देव!” -कहकर प्रणाम करती हुई मधूलिका राजमन्दिर के बाहर आई।

दुर्ग के दक्षिण, भयावने नाले के तट पर, घना जंगल है, आज मनुष्यों के पद-सञ्चार से शून्यता भंग हो रही थी। अरुण के छिपे वे मनुष्य स्वतन्त्रता से इधर-उधर घूमते थे। झाड़ियों को काटकर पथ बन रहा था। नगर दूर था, फिर उधर यों ही कोई नहीं आता था। फिर अब तो महाराज की आज्ञा से वहाँ मधूलिका का अच्छा-सा खेत बन रहा था। तब इधर की किसको चिन्ता होती?

क्रमशः

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