घनी कहानी, छोटी शाखा: जयशंकर प्रसाद की लिखी कहानी “ग्राम” का अंतिम भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है। कुछ दिनों से आप “घनी कहानी छोटी शाखा” में पढ़ रहे हैं, ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं “जयशंकर प्रसाद” की लिखी कहानी “ग्राम” ..आज दूसरा और अंतिम भाग)

ग्राम- जयशंकर प्रसाद 
भाग-2
(अब तक आपने पढ़ा। गाँव के स्टेशन पर मोहनलाल ट्रेन से उतरते हैं, स्टेशन मास्टर से बातचीत के दौरान ये पता चलता है कि वो कुसुमपुर के अपने इलाक़े में लोगों की जाँच-पड़ताल को निकले हैं। गाँव में अपने घोड़े पर सवार जब वो निकलते हैं तो उनके अंग्रेज़ी और हिंदुस्तानी मेल वाली वेशभूषा से  लोग घबराते भी हैं। ऐसे में उन्हें कुसुमपुर की ओर जाने की राह ठीक से पता नहीं चलती, लोगों की बताई राह पर चलते हुए वो आगे रास्ता जानने की इच्छा से एक ऐसी जगह पहुँचे हैं जहाँ एक पंद्रह साल की लड़की अपने काम में लगी है। मोहनलाल उससे रास्ता पूछने में झिझक रहे हैं। अब आगे..)

मोहनलाल ने घोड़ा बढ़ाकर उससे कुछ पूछना चाहा, पर संकुचित होकर ठिठक गए। परन्तु पूछने के अतिरिक्त दूसरा उपाय ही नहीं था। अस्तु, रूखेपन के साथ पूछा-“कुसुमपुर का रास्ता किधर है?”

बालिका इस भव्य मूर्ति को देखकर डरी, पर साहस के साथ बोली- “मैं नहीं जानती”

ऐसे सरल नेत्र-संचालन से इंगित करके उसने ये शब्द कहे कि युवक को क्रोध के स्थान में हँसी आ गयी और कहने लगा- “तो जो जानता हो, मुझे बतलाओ, मैं उससे पूछ लूँगा”

बालिका-“हमारी माता जानती होंगी”

मोहन- “इस समय तुम कहाँ जाती हो?”

बालिका-(मचान की ओर दिखाकर) “वहाँ जो कई लड़के हैं, उनमें से एक हमारा भाई है, उसी को खिलाने जाती हूँ”

मोहन-“बालक इतनी रात को खेत में क्यों बैठा है?”

बालिका-“वह रातभर और लडक़ों के साथ खेत में ही रहता है”

मोहन- “तुम्हारी माँ कहाँ है?”

बालिका- “चलिए, मैं लिवा चलती हूँ”

इतना कहकर बालिका अपने भाई के पास गयी, और उसको खिलाकर तथा उसके पास बैठे हुए लडक़ों को भी कुछ देकर उसी क्षुद्र-कुटीराभिमुख गमन करने लगी। मोहनलाल उस सरला बालिका के पीछे चले।

उस क्षुद्र कुटीर में पहुँचने पर एक स्त्री मोहनलाल को दिखाई पड़ी, जिसकी अंगप्रभा स्वर्ण-तुल्य थी, तेजोमय मुख-मण्डल, तथा ईषत् उन्नत अधर अभिमान से भरे हुए थे, अवस्था उसकी 50 वर्ष से अधिक थी। मोहनलाल की आन्तरिक अवस्था, जो ग्राम्य जीवन देखने से कुछ बदल चुकी थी, उस सरल गम्भीर तेजोमय मूर्ति को देख और भी सरल विनययुक्त हो गयी। उसने झुककर प्रणाम किया।

स्त्री ने आशीर्वाद दिया और पूछा- “बेटा! कहाँ से आते हो?”

मोहन- “मैं कुसुमपुर जाता था, किन्तु रास्ता भूल गया……।”

‘कुसुमपुर’ का नाम सुनते ही स्त्री का मुख-मण्डल आरक्तिम हो गया और उसके नेत्र से दो बूंद आँसू निकल आये। वे अश्रु करुणा के नहीं किन्तु अभिमान के थे।

मोहनलाल आश्चर्यान्वित होकर देख रहे थे।

उन्होंने पूछा-“आपको कुसुमपुर के नाम से क्षोभ क्यों हुआ?”

स्त्री- “बेटा! उसकी बड़ी कथा है, तुम सुनकर क्या करोगे?”

मोहन- “नहीं, मैं सुनना चाहता हूँ, यदि आप कृपा करके सुनावें”

स्त्री- “अच्छा, कुछ जलपान कर लो, तब सुनाऊँगी”

पुन: बालिका की ओर देखकर स्त्री ने कहा-कुछ जल पीने को ले आओ।

आज्ञा पाते ही बालिका उस क्षुद्र गृह के एक मिट्टी के बर्तन में से कुछ वस्तु निकाल, उसे एक पात्र में घोलकर ले आयी, और मोहनलाल के सामने रख दिया। मोहनलाल उस शर्बत को पान करके फूस की चटाई पर बैठकर स्त्री की कथा सुनने लगे।

स्त्री कहने लगी- “हमारे पति इस प्रान्त के गण्य भूस्वामी थे, और वंश भी हम लोगों का बहुत उच्च था। जिस गाँव का अभी आपने नाम लिया है, वही हमारे पति की प्रधान जमींदारी थी। कार्यवश कुंदनलाल नामक एक महाजन से कुछ ऋण लिया गया। कुछ भी विचार न करने से उनका बहुत रुपया बढ़ गया, और जब ऐसी अवस्था पहुँची तो अनेक उपाय करके हमारे पति धन जुटाकर उनके पास ले गए।”

तब उस धूर्त ने कहा- “क्या हर्ज है बाबू साहब! आप आठ रोज में आना, हम रुपया ले लेंगे, और जो घाटा होगा, उसे छोड़ देंगे, आपका इलाका फिर जायगा, इस समय रेहननामा भी नहीं मिल रहा है”

उसका विश्वास करके हमारे पति फिर बैठ रहे, और उसने कुछ भी न पूछा। उनकी उदारता के कारण वह संचित धन भी थोड़ा हो गया, और उधर उसने दावा करके इलाका-जो कि वह ले लेना चाहता था-बहुत थोड़े रुपये में नीलाम करा लिया। फिर हमारे पति के हृदय में, उस इलाके के इस भाँति निकल जाने के कारण, बहुत चोट पहुँची, और इसी से उनकी मृत्यु हो गयी। इस दशा के होने के उपरान्त हम लोग इस दूसरे गाँव में आकर रहने लगीं। यहाँ के जमींदार बहुत धर्मात्मा हैं, उन्होंने कुछ सामान्य ‘कर’ पर यह भूमि दी है, इसी से अब हमारी जीविका है”

इतना कहते-कहते स्त्री का गला अभिमान से भर आया और कुछ कह न सकी।

स्त्री की कथा को सुनकर मोहनलाल को बड़ा दु:ख हुआ। रात विशेष बीत चुकी थी, अत: रात्रि-यापन करके, प्रभात में मलिन तथा पश्चिमगामी चन्द्र का अनुसरण करके, बताये हुए पथ से वह चले गये।

पर उनके मुख पर विषाद तथा लज्जा ने अधिकार कर लिया था। कारण यह था कि स्त्री की जमींदारी हरण करने वाले, तथा उसके प्राणप्रिय पति से उसे विच्छेद कराकर इस भाँति दु:ख देने वाले कुंदनलाल मोहनलाल के ही पिता थे।

समाप्त

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