घनी कहानी, छोटी शाखा: जयशंकर प्रसाद की कहानी “पुरस्कार” का अंतिम भाग

पुरस्कार-जयशंकर प्रसाद

भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा..कौशल राज्य के वार्षिक कृषि उत्सव में जब मधूलिका की भूमि को चुना जाता है तो वो उत्सव का भाग तो बनती है लेकिन प्रथा के अनुसार अपनी भूमि के लिए चौगुना मूल्य लेने से इंकार कर देती है और अपनी भूमि को राज्य के लिए समर्पित कर देती है। उसका ऐसा करना वहाँ मौजूद मगध के राजकुमार अरूण को भाता है और वो अगले दिन मधूलिका से मिलने आता है। अपनी पैतृक भूमि के जाने से व्यथित मधूलिका राजकुमार को दो टूक जवाब देकर दुखी कर देती है और स्वयं भी दुखी होती है। इधर तीन वर्ष बीतने के बाद कठिन परिश्रम और अभाव से गुज़रती मधूलिका को एक रात अपने अभाव और परेशानी का विचार हो आता है साथ ही याद आता है मगध का राजकुमार अरूण भी, उस वक़्त वो राजकुमार से मिलने की इच्छा करती है और उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रहती जब राजकुमार उसी रात उसके द्वार आ पहुँचता है। दोनों एक-दूसरे के लिए अपने प्रेम को व्यक्त करते हैं। राजकुमार अपने राज्य से देशद्रोही बना भटक रहा है और वो मधूलिका से कहता है कि वो अपने बल से जल्द ही किसी राज्य का राजा बनेगा और उसे अपनी महारानी बनाएगा। इन्हीं बातों के बीच वो मधूलिका को कौशल की महारानी बनाने की बात कहता है और उससे एक मदद की बात कहता है। मधूलिका राजा के पास पहुँचकर उनसे अपनी खेती की भूमि के बराबर की ज़मीन जंगल के पास माँगती है। यूँ तो उस ज़मीन का सैन्य महत्व होता है किंतु मधूलिका को सामने देख कौशल-नरेश मना नहीं कर पाते। अरूण अपने सैनिकों के साथ आगे की प्रक्रिया में जुट गया है। अब आगे..)

एक घने कुञ्ज में अरुण और मधूलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। सन्ध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षीगण अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे।
प्रसन्नता से अरुण की आँखे चमक उठीं। सूर्य की अन्तिम किरण झुरमुट में घुसकर मधूलिका के कपोलों से खेलने लगी। अरुण ने कहा-“चार प्रहर और, विश्वास करो, प्रभात में ही इस जीर्ण-कलेवर कौशल-राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा और मगध से निर्वासित मैं एक स्वतन्त्र राष्ट्र का अधिपति बनूँगा, मधूलिके!”
“भयानक! अरुण, तुम्हारा साहस देखकर मैं चकित हो रही हूँ। केवल सौ सैनिकों से तुम…”
“रात के तीसरे प्रहर मेरी विजय-यात्रा होगी”
“तो तुमको इस विजय पर विश्वास है?”
“अवश्य, तुम अपनी झोपड़ी में यह रात बिताओ; प्रभात से तो राज-मन्दिर ही तुम्हारा लीला-निकेतन बनेगा”

मधूलिका प्रसन्न थी; किन्तु अरुण के लिए उसकी कल्याण-कामना सशंक थी। वह कभी-कभी उद्विग्न-सी होकर बालकों के समान प्रश्न कर बैठती। अरुण उसका समाधान कर देता। सहसा कोई संकेत पाकर उसने कहा- “अच्छा, अन्धकार अधिक हो गया। अभी तुम्हें दूर जाना है और मुझे भी प्राण-पण से इस अभियान के प्रारम्भिक कार्यों को अर्द्धरात्रि तक पूरा कर लेना चाहिए; तब रात्रि भर के लिए विदा! मधूलिके!”
मधूलिका उठ खड़ी हुई। कँटीली झाड़ियों से उलझती हुई क्रम से, बढ़नेवाले अन्धकार में वह झोपड़ी की ओर चली।

पथ अन्धकारमय था और मधूलिका का हृदय भी निविड़-तम से घिरा था। उसका मन सहसा विचलित हो उठा, मधुरता नष्ट हो गई। जितनी सुख-कल्पना थी, वह जैसे अन्धकार में विलीन होने लगी। वह भयभीत थी, पहला भय उसे अरुण के लिए उत्पन्न हुआ, “यदि वह सफल न हुआ तो?”- फिर सहसा सोचने लगी-“वह क्यों सफल हो? श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाय? मगध का चिरशत्रु! ओह, उसकी विजय! कौशल नरेश ने क्या कहा था-‘सिंहमित्र की कन्या।’ सिंहमित्र, कौशल का रक्षक वीर, उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है? नहीं, नहीं, मधूलिका! मधूलिका!!”- जैसे उसके पिता उस अन्धकार में पुकार रहे थे। वह पगली की तरह चिल्ला उठी। रास्ता भूल गई।

रात एक पहर बीत चली, पर मधूलिका अपनी झोपड़ी तक न पहुँची। वह उधेड़बुन में विक्षिप्त-सी चली जा रही थी। उसकी आँखों के सामने कभी सिंहमित्र और कभी अरुण की मूर्ति अन्धकार में चित्रित होती जाती। उसे सामने आलोक दिखाई पड़ा। वह बीच पथ में खड़ी हो गई। प्राय: एक सौ उल्काधारी अश्वारोही चले आ रहे थे और आगे-आगे एक वीर अधेड़ सैनिक था। उसके बायें हाथ में अश्व की वल्गा और दाहिने हाथ में नग्न खड्ग। अत्यन्त धीरता से वह टुकड़ी अपने पथ पर चल रही थी। परन्तु मधूलिका बीच पथ से हिली नहीं। प्रमुख सैनिक पास आ गया; पर मधूलिका अब भी नहीं हटी। सैनिक ने अश्व रोककर कहा- “कौन?”

कोई उत्तर नहीं मिला। तब तक दूसरे अश्वारोही ने सड़क पर कहा- “तू कौन है, स्त्री? कौशल के सेनापति को उत्तर शीघ्र दे”
रमणी जैसे विकार-ग्रस्त स्वर में चिल्ला उठी- “बाँध लो, मुझे बाँध लो! मेरी हत्या करो। मैंने अपराध ही ऐसा किया है”
सेनापति हँस पड़े, बोले- “पगली है”
“पगली नहीं, यदि वही होती, तो इतनी विचार-वेदना क्यों होती? सेनापति! मुझे बाँध लो। राजा के पास ले चलो”
“क्या है, स्पष्ट कह!”
“श्रावस्ती का दुर्ग एक प्रहर में दस्युओं के हस्तगत हो जायेगा। दक्षिणी नाले के पार उनका आक्रमण होगा”
सेनापति चौंक उठे। उन्होंने आश्चर्य से पूछा- “तू क्या कह रही है?”
“मैं सत्य कह रही हूँ; शीघ्रता करो”

सेनापति ने अस्सी सैनिकों को नाले की ओर धीरे-धीरे बढ़ने की आज्ञा दी और स्वयं बीस अश्वारोहियों के साथ दुर्ग की ओर बढ़े। मधूलिका एक अश्वारोही के साथ बाँध दी गई।
श्रावस्ती का दुर्ग, कौशल राष्ट्र का केन्द्र, इस रात्रि में अपने विगत वैभव का स्वप्न देख रहा था। भिन्न राजवंशों ने उसके प्रान्तों पर अधिकार जमा लिया है। अब वह केवल कई गाँवों का अधिपति है। फिर भी उसके साथ कौशल के अतीत की स्वर्ण-गाथाएँ लिपटी हैं। वही लोगों की ईर्ष्या का कारण है। जब थोड़े से अश्वारोही बड़े वेग से आते हुए दुर्ग-द्वार पर रुके, तब दुर्ग के प्रहरी चौंक उठे। उल्का के आलोक में उन्होंने सेनापति को पहचाना, द्वार खुला। सेनापति घोड़े की पीठ से उतरे। उन्होंने कहा- “अग्निसेन! दुर्ग में कितने सैनिक होंगे?”
“सेनापति की जय हो! दो सौ”
“उन्हें शीघ्र ही एकत्र करो; परन्तु बिना किसी शब्द के। सौ को लेकर तुम शीघ्र ही चुपचाप दुर्ग के दक्षिण की ओर चलो। आलोक और शब्द न हों”

सेनापति ने मधूलिका की ओर देखा। वह खोल दी गई। उसे अपने पीछे आने का संकेत कर सेनापति राजमन्दिर की ओर बढ़े। प्रतिहारी ने सेनापति को देखते ही महाराज को सावधान किया। वह अपनी सुख-निद्रा के लिये प्रस्तुत हो रहे थे; किन्तु सेनापति और साथ में मधूलिका को देखते ही चञ्चल हो उठे।

सेनापति ने कहा- “जय हो देव! इस स्त्री के कारण मुझे इस समय उपस्थित होना पड़ा है”
महाराज ने स्थिर नेत्रों से देखकर कहा- “सिंहमित्र की कन्या! फिर यहाँ क्यों? क्या तुम्हारा क्षेत्र नहीं बन रहा है? कोई बाधा? सेनापति! मैंने दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की भूमि इसे दी है। क्या उसी सम्बन्ध में तुम कहना चाहते हो?”

“देव! किसी गुप्त शत्रु ने उसी ओर से आज की रात में दुर्ग पर अधिकार कर लेने का प्रबन्ध किया है और इसी स्त्री ने मुझे पथ में यह सन्देश दिया है”
राजा ने मधूलिका की ओर देखा। वह काँप उठी। घृणा और लज्जा से वह गड़ी जा रही थी। राजा ने पूछा-“मधूलिका, यह सत्य है?”

“हाँ, देव!”

राजा ने सेनापति से कहा- “सैनिकों को एकत्र करके तुम चलो मैं अभी आता हूँ”- सेनापति के चले जाने पर राजा ने कहा- “सिंहमित्र की कन्या! तुमने एक बार फिर कौशल का उपकार किया। यह सूचना देकर तुमने पुरस्कार का काम किया है। अच्छा, तुम यहीं ठहरो। पहले उन आतताईयों का प्रबन्ध कर लूँ”

अपने साहसिक अभियान में अरुण बन्दी हुआ और दुर्ग उल्का के आलोक में अतिरञ्जित हो गया। भीड़ ने जयघोष किया। सबके मन में उल्लास था। श्रावस्ती-दुर्ग आज एक दस्यु के हाथ में जाने से बचा था। आबाल-वृद्ध-नारी आनन्द से उन्मत्त हो उठे।

ऊषा के आलोक में सभा-मण्डप दर्शकों से भर गया। बन्दी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हूँकार करते हुए कहा- “वध करो!”
राजा ने सबसे सहमत होकर आज्ञा दी- “प्राण दण्ड”
मधूलिका बुलायी गई। वह पगली-सी आकर खड़ी हो गई। कौशल नरेश ने पूछा- “मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, माँग। वह चुप रही”
राजा ने कहा- “मेरी निज की जितनी खेती है, मैं सब तुझे देता हूँ”
मधूलिका ने एक बार बन्दी अरुण की ओर देखा। उसने कहा- “मुझे कुछ न चाहिए”
अरुण हँस पड़ा।
राजा ने कहा- “मैं तुझे अवश्य दूँगा। माँग ले”
“तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले”
कहती हुई वह बन्दी अरुण के पास जा खड़ी हुई।

समाप्त

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