घनी कहानी, छोटी शाखा: गोपालराम गहमरी की कहानी “गुप्तकथा” का सातवाँ भाग

गुप्तकथा- गोपालराम गहमरी 

<भाग-7

 (अब तक आपने पढ़ा..हैदर अपने दोस्त जासूस को घर में आए इब्राहिम भाई के बारे में बताता है और ये भी बताता है कि उसका व्यवहार घर में सभी के साथ बुरा होने पर भी उसके पिता चिराग़ अली कुछ नहीं कहते थे। हैदर से इब्राहिम भाई की बहस के बाद भी चिराग़ अली हैदर को ही माफ़ी माँगने कहते हैं। इधर इब्राहिम भाई चिराग़ अली को धमकी देकर चले जाते हैं और उसके जाने के बाद से चिराग़ अली की तबियत बिगाड़ जाती है। इसी बीच एक चिट्ठी उन्हें मिलती है जिसे पाने के बाद चिराग़ अली भी एक ख़त देर रात तक जागकर लिखते हैं और अगले दिन उनकी पहले से ख़राब तबियत और ख़राब हो जाती है। वो हैदर से कहते हैं कि अब वो और नहीं जिएँगे, इस बात से हैदर को उनकी फ़िक्र होती है। ये सारी बात बताकर हैदर जासूस के साथ अपने घर पहुँचता है जहाँ उनके आने से पहले ही चिराग़ अली की मृत्यु हो चुकी होती है। जब घर के लोग अंतिम क्रिया के लिए बाहर गए होते हैं, उस समय एक विश्वासपात्र नौकर से पूछताछ करके और ज़रा तलाशी लेकर जासूस को वो ख़त मिल जाता है जो चिराग़ अली ने देर रात लिखा होता है। हैदर वो ख़त पढ़ने के लिए जासूस को ही देता है। जासूस हैदर के लिए ख़त पढ़ने लगता है। अब आगे..)  

चिट्ठी में यह लिखा था :

“बेटा हैदर! तुम्हीं एक मेरे लड़के हो। तुमको भी मालिक ने लड़का दिया है। इससे तुम ख़ूब समझ सकते हो कि तुम हमारे कैसे प्यारे हो। जिस दिन तुम्हारे ऊपर नाख़ुश होकर मैंने तुमको सामने से दूर कर दिया था उस दिन की बात मुझे याद है? एक साधारण बेजान-पहचान के आदमी को मारा था। मैंने उसके लिए तुम्हारा अपमान किया लेकिन वह इब्राहिम भाई कौन था सो मैंने तुमको नहीं बतलाया। उसको मैं इतना क्यों मानता था? उसके अनेक बड़े-बड़े क़सूर मैं क्यों माफ़ कर डालता था? उसके समान आदमी का इतना आदर मैंने क्यों किया था? इसके बतलाने का उस दिन अवसर नहीं था, आज उन सब बातों के बतलाने का मौक़ा आया है।

मैं जानता हूँ कि वह तुम्हारे ऊपर बहुत ज़ुल्म करते थे, हमारे बहुत पुराने और विश्वासी नौकरों को भी सताते थे, कई बार मैंने उनको दास-दासियों पर बेक़सूर मारपीट करते देखा है, बहुत से लायक आदमी उन्हीं के ज़ुल्म से हमारा घर छोड़कर चले गए। उन नौकरों के चले जाने से तुम लोगों को बहुत दुख हुआ तो भी मैं उन दिनों उनका हाल तुमसे नहीं कह सका वह सब कहने का मौक़ा अब आया है।

वह कौन थे और मैं उनके इतने अपराध क्यों सहता हूँ? यह सब तुम उन दिनों जान सकते तो उनके अपराधों की ओर तुम भी कुछ ध्यान नहीं देते; वह जो कुछ करते सब तुम भी चुपचाप देखते रहते। लेकिन ऐसा न करने से तुम इसमें कुछ भी क़सूरवार नहीं हो। तुम्हारा इसमें रत्ती भर भी दोष नहीं है। मैं अब उनका सब हाल कहने के पहले अपनी ही कथा कहता हूँ उसी से तुम सब समझ जावोगे।

‘देखो बेटा! मेरा असल नाम चिराग़ अली नहीं है न मैं इस कलकत्ते में पैदा हुआ हूँ। मेरा असल नाम अली भाई है। बंबई हाते का मदनपुर गाँव मेरा जन्मस्थान है। इब्राहिम भाई जहाँ रहते हैं वहीं का मैं भी पैदा हुआ हूँ। मेरे बाबा कुछ बहुत मशहूर नहीं तो कोई साधारण आदमी भी नहीं थे। मैं किसी बहुत बड़े धनी के घर में पैदा न होने पर भी जैसे धनी और कुमार्गी लोगों से लड़कपन में संग होने से चाल-चलन बिगड़ जाता है वैसे ही मेरी भी गति हुई। बेटा! मैं अपना यह सब हाल तुमसे कहते हुए शरमाता हूँ और मैं समझता हूँ तुम इस बात को समझते होगे। लेकिन क्या करूँ मैं इन सब गुप्त बातों को तुमसे न कह जाऊँ तो तुम ज़िंदगी भर संदेह में पड़े रहोगे। इसी से पिता को जो बात पुत्र से कहना लोकाचार से बाहर है, उसी को मैं आज कहता हूँ।

‘जिस गाँव में मैं रहता था वहाँ एक धनी ज़मींदार था। वह मेरे ही बराबर का एक लड़का छोड़कर मर गया। उन दिनों मैं सोलह या सत्तरह बरस का होऊँगा। मुझसे उस धनी पुत्र की मिताई थी। बहुधा धनी के लड़कों चाल-चलन जैसा होता है, उसका भी ठीक वैसा ही था। फिर उसके सदा साथ रहने से मेरा चाल-चलन वैसा ही बिगड़ जाएगा, इसमें क्या संदेह था। अपने बाप के मरने पर बहुत बड़े धन का मालिक होकर उसने अपना चाल-चलन और बिगाड़ दिया। उसके साथ मेरे सिवाय और भी जो दो-चार कुमार्गी थे, सबने मिलकर उसके धन से बड़ी मौज मारी और इतना कुकर्म करने लगे कि उस गाँव में भले आदमियों को स्त्री-पुत्र के साथ रहना कठिन हो गया। हम लोगों की आँख जिस गृहस्थ की बेटी-बहन पर पड़ती थी; उसको छल से हो, चाहे बल से हो, चाहे धन से हो, किसी तरह बिना बिगाड़े नहीं रहते थे। हम लोगों के दूत ऐसे लट्ठ थे कि जिस क़सम को कहो उसको तुरंत का तुरंत पूरा कर देते थे, इसी तरह कुकर्म करते हम लोगों को कुछ दिन बीत गए किसी तरह हम लोगों का पापाचार नहीं घटा।

‘जिस गाँव में मैं रहता था, उसके पास ही एक दूसरे गाँव में हमारी ही जाति का एक बहुत बड़ा धनी आदमी था। उसकी एक सुंदरी जवान लड़की थी। उस सुंदरी पर हमारे उसी धनी मित्र की आँख पड़ी। उसको हाथ में लाने के लिए हम लोगों ने बहुत सी तदबीर की, जब किसी तरह मतलब नहीं निकला तो तब हम लोगों ने डाकूपना करना शुरू किया। एक दिन उस सुंदरी का बाप कहीं किसी काम को बाहर गया, उसके साथ उसके घर के और कई नौकर गए थे। हम लोगों ने जासूस लगा रखे थे। जिस दिन यह ख़बर मिली उसी रात को हम लोगों नें अपना मतलब पूरा करने की तैयारी की। और ठीक आधी रात को हम लोग अपने साथियों सहित उसके घर में घुस गए और उस सुंदरी लड़की को लेकर आ गए। इस काम के कर डालने के बाद बड़ा गोलमाल हुआ। उसका बाप ख़बर पाकर बाहर से लौट आया। घर आते ही उसने थाने में इत्तिला की।

पुलिस वाले कमर कसकर उस लड़की को खोज में निकले। उन्होंने खूब ढूँढ़ खोज करके पीछे थककर रिपोर्ट की कि डकैती की इत्तिला जो गई है वह झूठी बात है उस धनी के घर पर डकैती नहीं हुई क्योंकि एक तिनका भी उसके घर का नहीं गया। जान पड़ता है कि उस धनी की विधवा सुंदरी बाहर निकल गई है। उसको उस तरह में इत्तिला करने में अपनी बेइज्जती उसने डकैती का बहाना करके इत्तिला की है। उसका मतलब यह है कि पुलिस डाकुओं की खोज करेगी और उसी में उस लड़की का पता लग जाएगा तो उसका काम निकल जाएगा।

इधर हमारे धनी मीत ने कुछ दिन तो उस जवान विधवा के साथ काटे। इतने में उनको एक और सुंदरी लड़की की बात किसी ने आ कही, तब उन्होंने अपना मन उस ओर दिया। और बहुत धन खर्च करके तो उस सुंदरी को हाथ में किया। जब यह दूसरी सुंदरी आई तब उस पहली विधवा सुंदरी पर से उनकी चाह हट गई। किंतु मैं उनको वहाँ से अलग ले जाकर अपनी स्त्री की तरह पालने लगा। मेरा उन दिनों ब्याह नहीं हुआ था इस कारण उसी पर मेरा प्रेम दिनोदिन बढ़ता गया। होते होते मैं उसको अपनी ब्याही घरनी के समान ही जानने लगा और उसके कामों से भी ऐसा ही जान पड़ता था कि वह मुझे अपने स्वामी के समान मानती है। इसी तरह हम दोनों का एक बरस बीत गया तो भी उसके बाप ने अपनी लड़की का कुछ पता नहीं पाया। वह लड़की भी बाप को अपना पता नहीं देना चाहती थी।

क्रमशः

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