घनी कहानी, छोटी शाखा: गोपालराम गहमरी की कहानी “गुप्तकथा” का तीसरा भाग

गुप्तकथा- गोपालराम गहमरी 

भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा..कलकत्ते से लौटे जासूस को उसका दोस्त हैदर अपने पिता चिराग़ अली की ख़राब सेहत के बारे में बताता है और इस बात की चिंता भी जताता है कि उनकी बीमारी की वजह कुछ और ही है। जासूस के पूछने पर हैदर उसे बताता है कि दयालु और दुखियों की सेवा करने में आगे रहने वाले उसके पिता चिराग़ अली के पास एक रोज़ एक शख़्स आया जिसे पहले तो उसके पिता ने नहीं पहचाना लेकिन बाद में उसका नाम जानते ही उन्होंने उसके लिए रहने और नौकरों का प्रबंध कर दिया। उसके बारे में हैदर को सिर्फ़ इतना ही मालूम था कि वो बम्बई से आया इब्राहिम भाई है। कुछ दिनों ठीक रहने के बाद इब्राहिम ने घर के नौकरों पर अपना रुआब झाड़ना शुरू कर दिया। कई विश्वासपात्र नौकरों को भी इतना तंग किया कि उन्होंने भी नौकरी छोड़ने में भलाई समझी। उसकी ये सारी बातें अगर नौकर चिराग़ अली को बताते तो भी वो उनके पक्ष में कोई बात न करता। एक दिन इब्राहिम, हैदर को तम्बाकू भरने का हुक्म देता है और उसके न मानने पर उसे भला-बुरा सुनाता है। हैदर पहले से ही उसकी हरकतों से परेशान उसे जूतों से पीट देता है। इस बात पर उसके पिता उसे वहाँ बुलाते हैं और सारी बात जानने के बाद भी हैदर को कहते हैं कि उसने ये काम करके बहुत बुरा किया है। उसे माफ़ी माँगनी चाहिए वरना उसके हक़ के लिए अच्छा नहीं होगा। अब आगे..)

मैंने उनकी बात सुन कर कहा – “मेरे हक़ में अच्छा हो या न हो लेकिन इस बात में मैं आपका कहना नहीं कर सकता। आप हमें बिलकुल अनुचित हुक्म दे रहे हैं। इसकी मार से आप क्यों दुखी हुए हैं, वह मेरी समझ में नहीं आता। यह बड़ा नीच आदमी है, साधारण पाहुने की तरह घर में आकर अब यह अपने को घर का मालिक समझता है और हम सब लोगों को नौकर-चाकर गिनता है। इसको अपनी पहली हालत याद नहीं है। अभी इसको मैंने इसकी करनी का पूरा फल नहीं दिया है। मैं आपके सामने कह देता हूँ, अगर यह फिर हमारे साथ इस तरह करेगा तो मैं आपके आगे ही इसे मारे जूतों के रँग दूँगा। और उसी दम कान पकड़कर बाहर करूँगा”

मेरी बात सुनकर पिताजी बोले – “देखो हैदर! मैंने समझा था कि तुम हमारी लायक औलाद हो। दया माया सब बातों में लोग तुमको मेरी ही तरह आदर से देखेंगे। लेकिन अब मैं देखता हूँ तो तुमको बिलकुल उलटा पाता हूँ। जो बेटा बाप की बात टाल दे उसका मुँह देखना भी पाप है। तू अभी मेरे सामने से दूर हो जा। बड़े लोग कहते आए हैं कि पिता की बात न मानने वाला बेटा बेटा नहीं है”

अब मैंने पिता की बात सुनकर कहा- “पिताजी आप मुझ पर नाहक क्रोध करते हैं। दंड दीजिए तो दोनों को दीजिए। और नहीं तो आप हमारे जन्मदाता पिता हैं आपका हुक्म मुझे सरासर आँखों से मानना है। इसी से आपकी बात मानकर मैं यहाँ से जाता हूँ लेकिन जाती बार इस बूढ़े को सिखलाए जाता हूँ”

इतना कहकर मैंने अपने पाँव से जूता निकालकर उस इब्राहिम भाई को ख़ूब बाज़ार भाव दिया। पिताजी ने बहुतेरा उनको बचाना चाहा लेकिन बूढ़ेपन से शरीर कमजोर के सबब “अरेरे, हैं! अरे पाजी! दूर हो दूर!”

इतना कहने के सिवाय और कुछ नहीं कह सके। पिता ने चिल्लाकर नौकरों को बुलाया लेकिन वहाँ कोई नहीं आया, तब मैं मनमाना उनकी जूतन दास से पूजा करके इतना कहता हुआ चला गया कि अब फिर भी तुम यहाँ रहे तो जानिए कि हमारे ही हाथ तुम्हारा काल है”

मुझ पर पिताजी इतना गुस्सा हुए थे कि उनके मुँह से फिर बात नहीं निकली वह वहीं बैठे काँपते रह गए।

मैं वहाँ से तो हट गया लेकिन घर छोड़कर कहीं नहीं गया। पास के एक कमरे में छिपकर सुनने लगा कि अब वहाँ क्या होता है। मैंने एक दरार से देखा कि बूढ़ा वहाँ से उठा और पिताजी से बोला –

“देखो अली साहब! मैं जाता हूँ लेकिन इसका बदला ले लूँ, तब मेरा नाम इब्राहिम भाई, नहीं तो नहीं”

वह बूढ़ा वहाँ से चला गया। पिता ने उसको बहुत रोका लेकिन उसने कुछ न माना। वह घमंड के मारे उनकी बात न मानकर वहाँ से चला गया।

जिस दिन वह बूढ़ा मेरे घर से चला गया उसी दिन से पिताजी का रंग बदला। उनके चेहरे पर कालिमासी पड़ गई। सदा वह किसी चिंता में चुपचाप रहने लगे। चिंता के साथ ही साथ उनका आहार भी घट गया, पहले जो उनका आहार था उसका अब दसवाँ भाग भी वह भोजन नहीं कर सकते थे।

जिस दिन पिता के सामने उस बूढ़े को जूते लगाकर वहाँ से चला आया उसी दिन से फिर मैं पिता के सामने नहीं गया, लेकिन छिपकर सदा देखता रहा कि पिताजी क्या करते हैं, कैसे रहते हैं, उनका दिन कैसे बीतता है उसका सब हाल मैं नौकरों से लिया करता था। पिताजी की यह दशा देखकर मैं भी डर गया कि क्या होगा? इब्राहिम भाई के अपमान से पिताजी ने भी सचमुच अपना अपमान समझा है या क्या? मुझे इस बात की बड़ी चिंता हुई कि पिताजी किस कारण इतना दुखी हुए हैं और क्यों उनकी ऐसी दशा हो रही है। मैं दिनोंदिन इस बात की खोज करने लगा परंतु कुछ भी पता नहीं लगा कि क्या बात है?

एक दिन सवेरे पिताजी अपनी बैठक में बैठे थे, देखने से मालूम पड़ता था कि वह किसी गहरी चिंता में चित्त दिए हुए कुछ मन ही मन विचार कर रहे हैं। इतने में डाकपियन ने आकर उनके हाथ में एक चिट्ठी दी। उसको बैठक में आकर अपने हाथ पिता को चिट्ठी देते हुए मैं बहुत अकचकाया, क्योंकि अब तक वह सदा द्वारपाल या और नौकरों को चिट्ठी दे जाता था। कभी भीतर बैठक में आकर अपने हाथ से पिताजी को चिट्ठी देते हुए मैंने उसके पहले किसी डाकपियन को नहीं देखा था।

लेकिन जब पीछे वह चिट्ठी मेरे हाथ आई तब देखा कि उस पर लिखा था, जिसके नाम चिट्ठी है उसके सिवाय किसी और के हाथ में नहीं देना।डाकपियन के चले जाने पर पिताजी ने उस चिट्ठी को खोलकर पढ़ा। एक बार नहीं दो बार नहीं बीसों बार उसको बड़े उत्साह से पढ़ने के बाद चिट्ठी को अपनी जेब में रख लिया।

क्रमशः

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